
यह कविता योग और प्राणायाम के महत्व को सरल भाषा में प्रस्तुत करती है। इसमें नियमित योगाभ्यास को स्वस्थ, संतुलित और सुखमय जीवन का आधार बताते हुए महर्षि पतंजलि, अंतरराष्ट्रीय योग दिवस तथा भारतीय योग परंपरा का उल्लेख किया गया है।
- योग अपनाएँ, निरोग जीवन पाएँ
- स्वास्थ्य की टार्च है योग
- योग-प्राणायाम से बने स्वस्थ जीवन
- योग: तन, मन और आत्मा का संतुलन
गणपत लाल उदय
अब दैनिक दिनचर्या में लाना होगा योग-प्राणायाम,
स्वास्थ्य संतुलन के खातिर करना पड़ेगा ये काम।
जीवन का महत्वपूर्ण आधार है यह, करें सवेरे-शाम,
तेजी से बढ़ती बीमारियों की जो करता रोकथाम।।
न लगेंगे अस्पतालों के चक्कर, नहीं होंगे पैसे खर्च,
मन एवं आत्मा के मध्य अब मस्तिष्क करेगा सर्च।
सीख लो अब सब मुस्कुराना, यह स्वास्थ्य की टार्च,
सुखमय जीवन जिएँ, न खाएँ ज्यादा नमक, मिर्च।।
समझें, समझाएँ योग के महत्व को, होगा देह का आभास,
अपने विचारों को शुद्ध रखो व बनो समय के दास।
सदियों से इन ऋषि-मुनियों का तपोवन था निवास,
योग-साधनाओं में डूबकर शुद्ध हवा में लेते श्वास।।
संयुक्त राष्ट्र ने दी मंजूरी, योग दिवस मनाएँ 21 जून,
जिसका श्रेय भारत को जाता, उड़ाएँ अनेक बलून।
जूनियस जूनो, ज्येष्ठ कहलाता, ग्रीष्म ऋतु, मानसून,
अनुलोम-विलोम प्राणायाम करें, बजाएँ प्यारी धुन।।
महर्षि पतंजलि को माना है योग-शास्त्रों का जनक,
लाभान्वित होना योग से, बरकरार रहेगी मुख की चमक।
उदय ने आज रची ये रचना, पड़ने दिया नहीं भनक,
युगों-युगों तक अब जीवित रहेगी योग की कनक।।
सैनिक की कलम
गणपत लाल उदय
अजमेर, राजस्थान
ई-मेल: ganapatlaludai77@gmail.com









