
यह कविता अपनों से मिले दर्द, अकेलेपन और जीवन की कठिनाइयों के बीच मनुष्य के भीतर जन्म लेती भावनाओं को व्यक्त करती है। कवि बताता है कि जब जीवन की ख्वाहिशें खत्म होने लगती हैं, तब कविता ही जीने की एक नई वजह बन जाती है। निष्ठुर जमाने से निराश होने के बावजूद मुस्कान और हौसले के सहारे आगे बढ़ने का भाव कविता में उभरता है।
- कविता से मिली जीने की वजह
- अकेलेपन से हौसले तक
- दर्द, उम्मीद और ख्वाहिशें
- निष्ठुर जमाने में मुस्कान
मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
अपने ही लगने लगे अजनबी से मुझे
ना मुहब्बत रही, ना आशा रही उनसे मुझे।
खुद ही खुद से बातें करने लगा मैं पागल
किसी से कोई वास्ता न रहा जब से मुझे।
मेरे आंसुओं की कीमत न समझी किसी ने
मेरे अपनों ने ही मारा धीमे जहर से मुझे।
मुश्किलें हौसलों की बड़ी वजह बन गईं
अब रास्ता पूछने की जरूरत नहीं किसी से मुझे।
खत्म जीने की जब हो गईं ख्वाहिशें
एक वजह मिल गई जीने की कविता से मुझे।
जमाने का क्या, जमाना तो हवा के पीछे चलता है
मनमौजी हूं, गम क्या खाक दूर करेगा मुस्कान से मुझे।
अपने आंसुओं का कतरा-कतरा बहाकर बैठा हूं
अब कोई उम्मीद नहीं निष्ठुर जमाने से मुझे।
– मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
ग्राम रिहावली, डाक घर तारौली गूजर, फतेहाबाद, आगरा, उत्तर प्रदेश







