
हरियाली तीज के लोकपर्व, सावन, प्रेम और विरह की भावनाओं को केंद्र में रखकर डॉ. प्रियंका सौरभ ने कविता में नारी मन की संवेदनाओं को अभिव्यक्त किया है। कविता में शिव-पार्वती की कथा, झूले, मेहँदी, चूड़ी और सावन के माध्यम से लोक-संस्कृति के बदलते स्वरूप और विरह की पीड़ा को उकेरा गया है। साथ ही, तीज के पारंपरिक स्वरूप और आधुनिक भोगवादी बदलाव के बीच लोक-संस्कृति की डोर को सँभालने का संदेश दिया गया है।
- सावन की बूँदों में विरह की पुकार
- तीज के रंग और विरह का दर्द
- हरियाली तीज में लोक-संस्कृति की पुकार
- नेह, विरह और सावन की छाँव
प्रियंका सौरभ
सावन आया द्वार पर, भीगी मन की पीर।
सूनी पलकों में बसी, प्रियतम की तस्वीर॥
झूला सूना डाल पर, सूनी है पनघाट।
मन में उठती हूक-सी, प्रिय बिन सूनी बाट॥
सूखी-सूखी मेहँदी, रंग न आया आज।
पायल भी चुप हो गई, किसका सुनूँ समाज॥
चूड़ी की टूटी छनक, करती मन से बात।
सावन की हर बूँद में, जागी बीती रात॥
डाल नीम की पूछती, सावन के हालात।
किसके संग अब झूलना, किसके संग हो बात॥
हरियाली बाहर हँसे, भीतर सूना गाँव।
रंग सभी फीके लगे, प्रिय बिन कैसी छाँव॥
श्रृंगारों का क्या करूँ, सूने हैं ये नैन।
मन की वीणा प्रिय बिना, बजती केवल रैन॥
तेज हवा सिसकी बनी, बादल बरसे नीर।
प्रिय की राह निहारती, बीत रही तकदीर॥
शिवा-पार्वती की कथा, कहे प्रेम संदेश।
एक अधूरी आस है, प्रिय बिन सूना वेश॥
सखियाँ झूले झूलतीं, गातीं सावन गीत।
मेरे मन कोने बसी, आज विरह की पीत॥
काँच की चूड़ी बिक रही, बाजारों में आज।
मन की चूड़ी टूटती, किसको कहूँ समाज॥
तीज बनी उत्सव भले, बदल गया व्यवहार।
भोग बढ़ा, पर योग का, खो गया संसार॥
व्रत की थाली सज गई, हाथों में है थाल।
मन की मौन तपस्या को, कौन करे अब निहाल॥
लोक-संस्कृति की डोर को, रखना सदा सँभाल।
सावन केवल पर्व नहीं, मन का पावन हाल॥
तीज पुकारे आज भी, लौटो अपने गाँव।
नेह, विरह और लोक की, फिर से रच दो छाँव॥
— डॉ. प्रियंका सौरभ
(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)
डॉ. प्रियंका सौरभ
पीएचडी (राजनीति विज्ञान)
कवयित्री | सामाजिक चिंतक | स्तंभकार
उब्बा भवन, आर्यनगर
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मोबाइल: 7015375570
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