
यह प्रेरक आलेख आदर्श संस्कारों, ईश्वर के प्रति आस्था और ईमानदार जीवन के महत्व पर प्रकाश डालता है। लेखक बताते हैं कि परिवार, नैतिक मूल्य और भ्रष्टाचार-मुक्त जीवन ही समाज और आने वाली पीढ़ियों की वास्तविक धरोहर हैं।
- संस्कारों से बनता है उज्ज्वल समाज
- आस्था, ईमानदारी और जीवन के मूल्य
- परिवार की सबसे बड़ी विरासत
- भ्रष्टाचार नहीं, संस्कार छोड़िए
आदर्श संस्कार भी एक वसीयत की तरह हैं, जो दुनिया को बताते हैं कि हमारे पूर्वजों ने हमें क्या दिया। पहले संयुक्त परिवार की प्रथा थी, जहाँ बच्चे खेल-खेल में बहुत-सी अच्छी बातें सीख जाते थे और परिवार का हर सदस्य बच्चों के साथ अपना अधिकांश समय बिताया करता था। जिसके कारण बच्चे कभी भी अकेले नहीं रह पाते थे और वे हर सदस्य से नई-नई बातें सीखते थे। यही ज्ञान की बातें आदर्श संस्कार थे। लेकिन आज एकाकी परिवार में बच्चों को रखने वाला भी कोई नहीं है, तब भला वह आदर्श संस्कारों को कैसे ग्रहण पाएँगे। नतीजतन आज बच्चों में क्रोध, गुस्सा, हिंसा, तोड़फोड़ और मारपीट की प्रवृत्ति देखने को मिल रही है तथा वे राष्ट्र की मुख्यधारा से कटकर अनैतिक कार्य भी करने लगे हैं। रही-सही कसर महँगी शिक्षा-पद्धति व बेरोजगारी की समस्या ने पूरी कर दी, जिसका परिणाम बढ़ती हिंसा, बलात्कार, चोरी-डकैती की घटनाओं के रूप में दिखाई दे रहा है। तभी तो कहा गया है कि आदर्श संस्कार एक वसीयत के रूप में हैं, इससे कोई इंकार नहीं कर सकता।
ऊपर वाले पर आस्था
आज का इंसान भले ही हर रोज धार्मिक स्थलों व मंदिर में न जाता हो, लेकिन ईश्वर के प्रति आस्था से वह इंकार नहीं कर सकता। हम देखते हैं कि आज के इंसान के पास थोड़ा-सा धन, गाड़ी, बंगला, नौकर-चाकर क्या आ जाए, वह किसी से भी सीधे मुँह बात नहीं करता है। विवाह से पूर्व दहेज, नौकरी, कन्या की सुंदरता, शिक्षा और चाल-चलन देखने के बाद भी इंसान बोलता है कि जोड़ियाँ तो ऊपर वाला बनाता है। अगर आपको ईश्वर पर इतना विश्वास है, तो फिर ये उपरोक्त बातें लड़की में क्यों देखीं? ऊपर वाले में निस्वार्थ भाव से निष्ठा रखिए। दुल्हन ही दहेज है। वह आपके परिवार में ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में आई है। अतः उसे बहू के रूप में नहीं, अपितु बेटी का दर्जा दीजिए। फिर देखिए, इस बहू रूपी चाँद को देखकर आसमान में स्थित चाँद भी शर्मा जाएगा।
नसीब, बदनसीब व खुशनसीब
कहते हैं कि जरूरत से ज्यादा मिले, उसे कहते हैं नसीब। भगवान का दिया सब कुछ है, फिर भी रोता रहता है, उसे कहते हैं बदनसीब। और जिंदगी में थोड़ा पाकर भी सदा खुश रहता है, उसे कहते हैं खुशनसीब। लेकिन आज का इंसान भ्रष्टाचार में इतना डूब गया है कि वह कितना भी धन भ्रष्टाचार के जरिए एकत्र कर ले, उसकी लालसा कभी भी खत्म नहीं होती। भ्रष्टाचार की गंगा में डुबकी लगाते-लगाते वह इतना निर्लज्ज हो गया है कि दान में मिली धनराशि भी चुराने लग गया।
जिस व्यक्ति की आत्मा इस तरह निर्लज्ज हो गई हो, उसे और उसकी सात पीढ़ियों तक को ईश्वर कभी माफ नहीं करेगा। चूँकि इंसान को जब कहा जाता है कि मशीन बनकर नहीं, इंसान बनकर जियो, तब वह कहता है कि सात पीढ़ियों की चिंता खाए जा रही है। अरे मेरे भाई! अगर आने वाली पीढ़ियाँ योग्य होंगी तो स्वयं कमा कर खा लेंगी, और दुष्ट होंगी तो जो भी होगा, उसे गलत कार्यों में उड़ा देंगी। अतः ईमानदारी व निष्ठा से कार्य करें तथा भ्रष्टाचार-मुक्त जीवन व्यतीत करें।
— सुनील कुमार माथुर
जोधपुर, राजस्थान









