
वरिष्ठ पत्रकार राजशेखर भट्ट के पत्रकारिता जीवन, संघर्ष, निष्पक्षता और साहित्य के प्रति उनके समर्पण को रेखांकित किया गया है। लेख में उनके द्वारा नए लेखकों और पत्रकारों को दिए जा रहे प्रोत्साहन तथा सामाजिक सरोकारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का उल्लेख है। लेखक ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों के माध्यम से राजशेखर भट्ट के प्रति स्नेह, सम्मान और आभार व्यक्त किया है।
- निष्पक्ष पत्रकारिता की मिसाल राजशेखर भट्ट
- संघर्ष से सम्मान तक राजशेखर भट्ट का सफर
- पत्रकारिता के साथ साहित्य सेवा का अनूठा प्रयास
- राजशेखर भट्ट: कलम से समाज सेवा का संकल्प
सुनील कुमार माथुर, जोधपुर, राजस्थान
कोरोना काल को हमने बहुत नजदीक से देखा। इस समय ने हमारे जीवन को संकट में डाल दिया और जीवन में कुछ समय के लिए विराम डाल कर देश की समूची व्यवस्था को झंझोर कर रख दिया। लोग एक-दूसरे से हाथ मिलाने से डरने लगे। जनता इतनी भयभीत हो गई थी कि किसी के हाथ का पानी भी नहीं पीती थी। इस काल में लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाने वाला स्तंभ पत्रकारिता भी लड़खड़ा गई। वहीं अनेक छोटे व मंझोले समाचार पत्र व पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद हो गया और ऑनलाइन पत्रकारिता आरम्भ हो गई, जो एक दुःख का विषय है। ऑनलाइन पत्रकारिता में वह आनन्द नहीं है, जो प्रिंट पत्र-पत्रिकाओं को हाथ में लेकर पढ़ने में है।
आजादी के वक्त की पत्रकारिता मिशनरी पत्रकारिता थी। चूंकि हमारे आजादी के दीवाने न केवल भारत माता को अंग्रेजी दासता से मुक्त ही कराना चाहते थे, अपितु देश की जनता में आजादी का शंखनाद फूंकना भी था। इस वजह से उन पर दोहरी जिम्मेदारी थी। हमारा देश 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ था और इसी अगस्त माह की 22 अगस्त को आजादी की वर्षगांठ वाले माह में पत्रकार चन्द्र शेखर भट्ट के यहां राजशेखर भट्ट का जन्म हुआ।
चन्द्र शेखर भट्ट एक निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकार के साथ एक आदर्श शिक्षक भी थे। इसलिए राजशेखर भट्ट को बचपन में ही आदर्श संस्कार प्राप्त हुए। स्वर्गीय पत्रकार चन्द्र शेखर भट्ट के आदर्श पदचिह्नों पर चलते हुए राजशेखर भट्ट ने भी पत्रकारिता के व्यवसाय को चुना और निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता कर रहे हैं। राजशेखर भट्ट एक निर्भीक, निडर, निष्पक्ष, ऊर्जावान व वरिष्ठ पत्रकार हैं। आपकी कलम तलवार से भी तेज है। यही वजह है कि उन्होंने भ्रष्ट नेताओं व अधिकारियों को अपनी लेखनी के जरिए आईना दिखा दिया।
संघर्षशील पत्रकार
वे बड़े ही संघर्षशील पत्रकार हैं। पत्रकारिता ही उनकी आजीविका है, जो वे निरन्तर करते आ रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता की शाख को सदैव बनाये रखा। जब उत्तराखण्ड सरकार ने राजशेखर भट्ट को मान्यता प्राप्त पत्रकारों की श्रेणी में शामिल नहीं किया, तब उन्होंने इसके लिए संघर्ष किया और आखिर में सूचना एवं लोक संपर्क विभाग, उत्तराखण्ड सरकार, जनपद देहरादून ने राजशेखर भट्ट को 17 मई 2025 को मान्यता प्राप्त पत्रकारों की श्रेणी का प्रेस कार्ड जारी किया, जो पत्रकार राजशेखर भट्ट की एक नई उपलब्धि है। कहने का तात्पर्य यह है कि संघर्षशील रहकर भी वे कभी टूटे नहीं, झुके नहीं।
मिशनरी पत्रकारिता
राजशेखर की पत्रकारिता मिशनरी पत्रकारिता है। वे समाज की हर ज्वलंत समस्याओं को उजागर करने में कभी पीछे नहीं रहते हैं। उनके लिखे सम्पादकीय सटीक व चिंतन-मनन योग्य होते हैं। उसमें तनिक भी लाग-लपेट नहीं होती है, अपितु कटु सत्य होता है। आज देश में बड़े-बड़े समाचार पत्र विज्ञापन पाने के लिए पीत पत्रकारिता कर रहे हैं, इसके बावजूद भी राजशेखर भट्ट अपने रचनात्मक मिशन पर चल रहे हैं एवं पीत पत्रकारिता से कोसों दूर हैं।
राजशेखर भट्ट ने सदैव नये लेखकों व पत्रकारिता में रुचि रखने वाले युवाओं को प्रोत्साहन दिया और आज भी दे रहे हैं। उन्होंने हमेशा देवभूमि समाचार पत्र के पटल पर व इंडियन आईडल पत्रिका में पाठकों को व रचनाकारों को गौरवमय स्थान दिया व विभिन्न विषयों पर लेखन प्रतियोगिता आयोजित कर उन्हें सम्मान पत्र प्रदान कर सम्मानित किया। उसी के साथ ही साथ समय-समय पर उनका हौसला अफजाई किया। इतना ही नहीं, साहित्यकार ही नहीं हैं, अपितु एक सच्चे इंसान, सच्चे मित्र, पत्रकार व अपने साथी मित्रों को सही पथ दिखाने वाले शिक्षक भी हैं। देवभूमि समाचार पत्र हमेशा मूल्यों की लड़ाई लड़ता रहा है। यही वजह है कि पत्रकार स्व. चन्द्र शेखर भट्ट द्वारा लगाया गया पौधा आज विशाल वटवृक्ष बन चुका है।
भट्ट के चिंतन व लेखन में आधुनिक दौर की अनेक समस्याओं के समाधान के मार्ग भी हैं। वे अपनी लेखनी से जनाकांक्षाओं व जन विचारों की अभिव्यक्ति करते हैं। पत्रकार राजशेखर भट्ट नैतिकता का दीप जलाकर समाज में प्रकाश फैलाने का कार्य कर रहे हैं। एक निष्पक्ष व निर्भीक पत्रकार के रूप में सत्य को साहस के साथ लिख रहे हैं, जो राष्ट्र उत्थान के लिए एक शुभ संकेत है। सहज और सरल भाषा में उनके प्रत्येक आलेख व समाचार समाज को चिंतन-मनन के लिए प्रेरित करते हैं।
राजशेखर भट्ट ने जून 2025 से रचनाकारों की रचनाओं के साथ समय-समय पर सम्पादकीय टिप्पणी भी लिखना आरम्भ कर दिया और रचनाओं को अधिक से अधिक पाठकों के पढ़ने लायक बनाने के लिए आवश्यक संशोधन भी करना आरम्भ किया है, जो एक नवीनतम प्रयोग है, जो आज तक किसी पत्र-पत्रिकाओं में देखने को नहीं मिला है। यह राजशेखर भट्ट की अनोखी पहल है, जो स्वागत योग्य है। आज हर रचना के संग वे रचना को पढ़कर रोचक तरीके से नन्हे-नन्हे शीर्षक पंक्तियों के रूप में लिखते हैं। बॉक्स बनाकर उसमें रचना का सार लिखते हैं। इतनी मेहनत आज के इस तकनीकी युग में कौन करता है, लेकिन राजशेखर भट्ट की सोच अलग ही है। वे हर दिन कुछ नया देने की चाह रखते हैं, जो कोई विरला पुरुष ही कर सकता है अथवा साहित्य को समर्पित व्यक्ति ही। वरना इस कलयुग में कॉपी-पेस्ट और साहित्य की चोरी के सिवाय कुछ भी नहीं है।
भट्ट के मन में मैंने सदैव परोपकार का ही भाव देखा है। उनके मन में सेवा का भाव ऐसा कूट-कूट कर भरा हुआ है कि उनका पत्रकारिता की ओर रुझान हो गया व साहित्य सृजन एवं पत्रकारिता के माध्यम से समाज की सच्ची व उत्कृष्ट सेवा कर रहे हैं। आम जन में साहित्य के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए उन्होंने अपने स्तर पर समय-समय पर अनेक प्रयोग किये व साहित्यकारों की एक टीम तैयार की। श्रेष्ठ साहित्य सृजन के लिए राजशेखर भट्ट आज भी प्रयासरत हैं और साहित्यकारों में साहित्य सृजन का अलख जगाने का प्रयास सदैव बना रहना चाहिए।
गीत, संगीत प्रेमी
उनका जीवन एक खुली किताब है। उन्हें पत्रकारिता के अलावा गीत-संगीत, भ्रमण, नित नये प्रयोग करने का भी शौक है। अपने साथी मित्रों के बीच हंसी-मजाक भी करते रहते हैं तो शंका का समाधान भी करने से नहीं हिचकिचाते हैं। रचनाकारों का मार्गदर्शन कर उन्हें एक नई दशा और दिशा प्रदान करते हैं। वे पत्रकारिता के जरिए समाज की निस्वार्थ भाव से सेवा कर रहे हैं, जो अतुलनीय है।
उनकी कार्यशैली, व्यवहार कुशलता, सकारात्मक सोच, नेतृत्व व संगठन निर्माण की क्षमता, दूरदर्शिता, समर्पण का भाव वंदनीय और सराहनीय है। उनकी सादगी, शालीनता, सहृदयता व सहिष्णुता वास्तव में हमें उनके साथ कार्य करने के लिए सतत प्रेरित करती हैं। चूंकि हम भाग्यशाली हैं कि हमें उनका सानिध्य प्राप्त हुआ है। यही वजह है कि जो व्यक्ति एक बार राजशेखर भट्ट के संपर्क में आ जाता है, तो वह सदा उनका मित्र होकर रह जाता है। वे जितने सिनेमा प्रेमी हैं, उतना ही साहित्य प्रेमी भी हैं।
मैं देवभूमि समाचार पत्र के सम्पर्क में सितम्बर 2019 में आया और मेरी पहली रचना 30 सितम्बर 2019 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी पर प्रकाशित हुई और उसके बाद से निरन्तर रचनाएं प्रकाशित हो रही हैं और अब तक करीबन एक हजार से भी अधिक रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं, जिसमें पुस्तक समीक्षा, महिला जगत, राजनीति, जन समस्याओं को लेकर सम्पादक के नाम पत्र, व्यंग्य, स्मृति शेष, जयन्ती, पुण्यतिथि पर आलेख आदि आदि सम्मिलित हैं। राजशेखर भट्ट ने हमेशा मार्गदर्शन किया और हौसला अफजाई भी। मेरे प्रति वो बेहद स्नेह रखते हैं और मेरे मन में उनके प्रति विशेष लगाव है। वे समय-समय पर साहित्यकारों का मार्गदर्शन भी करते रहते हैं।
आपका स्नेह यूं ही बरसता रहे
आज तक आप से व्यक्तिगत रूप से नहीं मिला और आपको गले लगाकर यह नहीं कह पाया कि मैं आप से कितना स्नेह करता हूं। शायद हम दोनों को कभी यह कहने की जरूरत भी नहीं पड़ी, क्योंकि आपका प्यार आपकी सीख में है। आपके भरोसे में है। आपने मुझे साहित्य सृजन के क्षेत्र में निरन्तर आगे बढ़ने के लिए हिम्मत दी। मेरे लेखन को नई दशा व दिशा दी। राजशेखर भट्ट से मैंने न केवल मित्रता ही की, अपितु लेखन की बारीकियां भी सीखी। लोगों का सम्मान करना, अपनी मिट्टी से जुड़े रहना और बड़े सपने देखना, यह बात आप सभी कलमकारों को सलाह के रूप में बताते हो। पत्रकार भट्ट ने प्रेम और विश्वास की जो विरासत बनाई, उसे आगे बढ़ाना हर साहित्य सृजनकर्ता का सपना भी है और जिम्मेदारी भी। साहित्य जगत के क्षेत्र में हर कदम पर उनका साथ है। यही साहित्य सृजनकर्ता की सबसे बड़ी पूंजी है, ताकत है, शक्ति है व आत्मबल है।
जीवन की डगर में कभी भी व्यक्तिगत रूप से गले न मिले, लेकिन आज तक प्रेम, स्नेह, धैर्य, सहनशीलता बनी हुई है। पत्रकार राजशेखर भट्ट का स्नेह इसी तरह बरसता रहे, यही मेरी उनसे प्रार्थना है। हां, एक शिकायत जरूर है कि देवभूमि के पटल पर नियमित रूप से (हर रोज) आलेखों का प्रकाशन बंद सा है, जिसे शीघ्रता से हर रोज आलेख प्रकाशित कर कलमकारों की लेखनी में नई जान फूंकने का कार्य करे, अन्यथा कहीं लेखनी को जंग न लग जाये और वह दम तोड़ दे। पत्रकार राजशेखर भट्ट अपने पत्रकारिता के मिशन में सदैव कामयाब हों। यही हमारी हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं हैं।
सुनील कुमार माथुर
सदस्य अणुव्रत लेखक मंच एवं
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार
33 वर्धमान नगर, शोभावतों की ढाणी, खेमे का कुआं, पाल रोड, जोधपुर, राजस्थान







