
सोने-चांदी की बेतहाशा बढ़ती कीमतों ने आम आदमी की जरूरतों और सपनों को गहरी चोट दी है। कविता निवेश, लोभ, महंगाई और सामाजिक यथार्थ पर करारा व्यंग्य प्रस्तुत करती है।
- सोना-चांदी की उड़ान और आम आदमी की पीड़ा
- महंगाई का प्रहार : चांदी चांद पर, सोना स्वर्ग में
- निवेश, लोभ और पछतावे की कहानी
- महंगे गहने, टूटते सपने : एक व्यंग्य कविता
गणपत लाल उदय
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अब चांदी पहुँच गई चाँद पर, पहुँचा स्वर्ग यही सोना,
मालामाल वे हो गए जिन्होंने बेचा ना पैतृक गहना।
अब बन गए वे अरबपति जो रोते लखपति का रोना,
निवेशकों की रुचि बढ़ी, इसका असर ये सब सहना।।
वाह री चांदी वाह रे सोना, आज आ रहा हमको रोना,
छू रहा तू आज आसमान, दूभर हुआ अब तुझे लाना।
कभी बेच दिया कम दाम में, अब याद आए तेरा होना,
बचा न पाया मैं दोनों को, ये महँगा पड़ा तुझे खोना।।
एकदम दाम बढ़ जाने से यह पड़ रहा है मुझे कहना,
कैसे लाएँ अब फिर तुझको, क्या दें बहू, बेटी, बहना।
बड़ी दयनीय हो गई स्थिति, हॉलमार्क खरीदना गहना,
धरे रह गए अब सभी सपने, महँगाई मार को सहना।।
अब गोटा-चांदी के आभूषण सभी स्त्रियाँ पहनें रहना,
ऑनलाइन गेम खेल-खेलकर खेत-प्लॉट न बेच देना।
मेरा तो यह कर्म है भैया, शिक्षाप्रद कविताएँ लिखना,
किसी के लोभ में आकर के यह लक्ष्मी लुटा न देना।।
भारत सहित बड़े देशों ने आज स्वर्ण भंडार है बढ़ाया,
दुनियाभर में इसलिए सोने-चांदी का किल्लत आया।
ना लेना कभी कर्ज किसी से, न उधार पैसा कोई देना,
भूगतभोगी हूँ मैं साक्षात, मेरे पैसे अब तक न आया।।
सैनिक की कलम, गणपत लाल उदय
अजमेर, राजस्थान | 📧 ganapatlaludai77@gmail.com










