
सरकारी अस्पताल में सेवा देने वाले रामभूषण जी धार्मिकता और मानव सेवा का दिखावा करते हुए मरीजों से पैसे वसूलते हैं और जरूरतमंदों की अनदेखी करते हैं। इसके बावजूद उन्हें सम्मान और प्रमोशन मिलना व्यवस्था की विडंबना को उजागर करता है।
- रामभूषण जी की सेवा का सच
- सेवा की आड़ में वसूली
- धर्म और सेवा का दिखावा
- सम्मान के पीछे छिपी हकीकत
मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
रामभूषण जी कूतुकूपुर के ग्रामीण सरकारी अस्पताल में अपनी सेवाएं दे रहे थे। अस्पताल विशाल था, परंतु स्टाफ के नाम पर रामभूषण जी अकेले ही नजर आते थे। बाकी कर्मचारी पदस्थ थे या नहीं, मालूम नहीं। रामभूषण जी आने वाले मरीजों को श्रीरामचरितमानस के दोहे-चौपाइयां गा-गाकर खूब सुनाते। ऐसा लगता जैसे धर्म और सेवा रामभूषण जी के रोम-रोम में बसे थे।
परंतु हकीकत में वे सिर्फ ढोंग करते थे। हर मरीज से बीस रुपए से लेकर सौ रुपए तक वसूलते थे। सरकारी अस्पताल में फीस एक रुपया या लगभग निशुल्क ही होती है। लेकिन रामभूषण जी दिन भर में हजारों रुपए ऐसे ही छाप लेते।
हद तो तब हो गई जब एक दिन एक बुढ़िया दवा लेने आई और उसके पास एक रुपया भी न था, तो रामभूषण जी ने दो लाल रंग की गोली मेज पर फेंक कर श्रीरामचरितमानस की चार चौपाई बुढ़िया को सुना दीं। बुढ़िया बेचारी गिड़गिड़ाती रही कि डाक्टर साहब, मेरी आंखों में जलन है, कोई आंखों की दवा दे दो। रामभूषण जी ने समय देखा, दो बजने को आए, तुरंत अस्पताल से निकलने की तैयारी में अपना बैग उठाकर चल दिए, तभी एक मरीज और आ टपका। डाक्टर साहब ने कहा-‘कल आना, अब मेरा निकलने का समय हो गया।’ और डाक्टर साहब चमचमाती कार से फुर्र हो गए।
रामभूषण जी की धार्मिकता और मानव सेवा के लिए सरकार ने उन्हें कई सम्मान दिए और प्रमोशन भी। फिलहाल रामभूषण जी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।








