
भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) की अध्ययन रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि उत्तराखंड के प्रमुख धामों में पीक सीजन के दौरान श्रद्धालुओं की संख्या उपलब्ध संसाधनों पर भारी पड़ रही है। रिपोर्ट में पार्किंग, शौचालय, कचरा प्रबंधन और पर्यावरणीय जोखिमों को लेकर कई कमियां चिन्हित करते हुए भीड़ प्रबंधन और आधारभूत सुविधाओं के विस्तार की सिफारिश की गई है।
- केदारनाथ से हेमकुंड तक बढ़ी चुनौती, श्रद्धालुओं की भीड़ से व्यवस्थाएं प्रभावित
- धारण क्षमता से अधिक दबाव झेल रहे धाम, पार्किंग और शौचालय बने बड़ी समस्या
- चारधाम यात्रा प्रबंधन पर सवाल, कचरा निस्तारण और सुविधाओं में खामियां उजागर
- WII अध्ययन में खुलासा, तीर्थस्थलों पर भीड़ नियंत्रण के लिए ठोस रणनीति की जरूरत
देहरादून। उत्तराखंड के प्रमुख तीर्थस्थलों पर हर वर्ष बढ़ रही श्रद्धालुओं की संख्या अब व्यवस्थाओं के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) द्वारा किए गए विस्तृत अध्ययन में सामने आया है कि केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री और हेमकुंड साहिब जैसे प्रमुख धामों में पीक सीजन के दौरान उपलब्ध संसाधन श्रद्धालुओं की संख्या के मुकाबले अपर्याप्त साबित हो रहे हैं। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि अत्यधिक भीड़ के कारण आवास, पार्किंग, स्वच्छता, कचरा प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी व्यवस्थाओं पर गंभीर दबाव पड़ रहा है।
उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीसीबी) ने वर्ष 2024 में डब्ल्यूआईआई को चार प्रमुख तीर्थस्थलों की धारण क्षमता (कैरीइंग कैपेसिटी) का वैज्ञानिक अध्ययन करने की जिम्मेदारी सौंपी थी। संस्थान ने लगभग एक वर्ष तक विभिन्न पहलुओं का अध्ययन किया। इसमें तीर्थयात्रियों की संख्या, ठहरने की क्षमता, पेयजल उपलब्धता, स्वास्थ्य सेवाएं, सुरक्षा प्रबंधन, वाहन पार्किंग, आवागमन व्यवस्था, घोड़े-खच्चरों की संख्या तथा उनके रखरखाव समेत कई महत्वपूर्ण बिंदुओं को शामिल किया गया। अध्ययन के दौरान पाया गया कि यात्रा सीजन के चरम समय में श्रद्धालुओं की संख्या इतनी अधिक हो जाती है कि धामों की मूलभूत सुविधाएं जवाब देने लगती हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि कई स्थानों पर पार्किंग क्षमता कम होने के कारण वाहनों की लंबी कतारें सड़कों पर खड़ी रहती हैं। इससे यातायात व्यवस्था प्रभावित होती है और स्थानीय निवासियों को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
रिपोर्ट में केदारनाथ धाम का विशेष उल्लेख किया गया है। अध्ययन के अनुसार यहां पीक सीजन के दौरान हर घंटे 20 से 30 हेलिकॉप्टर उड़ान भरते हैं। इनसे उत्पन्न ध्वनि 50 डेसीबल से अधिक दर्ज की गई, जबकि वन्यजीवों पर 40 डेसीबल से अधिक ध्वनि का प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। विशेषज्ञों ने हेलिकॉप्टर संचालन के पर्यावरणीय प्रभावों का भी आकलन करने की आवश्यकता जताई है। कचरा प्रबंधन को लेकर भी रिपोर्ट में गंभीर चिंताएं व्यक्त की गई हैं। अध्ययन में पाया गया कि चारों धामों में कुल 24 प्रकार के अपशिष्ट उत्पन्न हो रहे हैं। गंगोत्री और हेमकुंड साहिब में कचरा संग्रहण की व्यवस्था अपेक्षाकृत बेहतर पाई गई, लेकिन वहां भी अपशिष्ट प्रसंस्करण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। दूसरी ओर, केदारनाथ और यमुनोत्री में कचरा संग्रहण और निस्तारण दोनों ही स्तरों पर कमियां सामने आईं। रिपोर्ट के अनुसार यमुनोत्री में कचरा प्रबंधन की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक है।
अध्ययन में यह भी उल्लेख किया गया है कि गंगोत्री और यमुनोत्री में कुछ स्थानों पर कचरे को जलाने की प्रक्रिया अपनाई जा रही थी, जिससे पर्यावरणीय जोखिम बढ़ने की आशंका बनी रहती है। गंगोत्री स्थित कूड़ा जलाने वाले संयंत्र का संचालन जुलाई 2025 के बाद बंद कराया गया था, जबकि यमुनोत्री क्षेत्र में भी कचरा निस्तारण संबंधी व्यवस्थाओं में सुधार की आवश्यकता बताई गई है। स्वच्छता सुविधाओं के मामले में भी रिपोर्ट ने कई सवाल खड़े किए हैं। केदारनाथ मार्ग पर रुद्र प्वाइंट से धाम तक सार्वजनिक शौचालयों की क्षमता सीमित पाई गई। बढ़ती भीड़ के कारण खुले में शौच की घटनाएं भी सामने आने की बात रिपोर्ट में कही गई है। विशेषज्ञों ने यात्रियों की संख्या के अनुपात में शौचालयों और स्वच्छता सुविधाओं का विस्तार करने की सिफारिश की है।
घोड़े-खच्चरों के संचालन को लेकर भी रिपोर्ट में चिंता व्यक्त की गई है। अध्ययन में कहा गया है कि कई स्थानों पर रात के समय भी पशुओं के माध्यम से यात्रा कराई जा रही है, जिससे पशु कल्याण संबंधी प्रश्न खड़े होते हैं। रिपोर्ट में खच्चरों के प्रति संवेदनशील और मानवीय व्यवहार सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश लागू करने की आवश्यकता बताई गई है। डब्ल्यूआईआई ने अपनी रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। इनमें तीर्थयात्रियों का शुल्क आधारित पंजीकरण, भीड़ नियंत्रण के लिए वैज्ञानिक प्रणाली विकसित करना, भूस्खलन जोखिम वाले क्षेत्रों की निगरानी बढ़ाना, पार्किंग क्षमता का विस्तार, शौचालयों की संख्या बढ़ाना, आधुनिक कचरा प्रबंधन प्रणाली लागू करना और वन्यजीवों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यात्रा संचालन की नई रणनीति तैयार करना शामिल है।
रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि यदि भविष्य में तीर्थयात्रियों की संख्या इसी गति से बढ़ती रही तो वर्तमान संसाधन और व्यवस्थाएं पर्याप्त नहीं होंगी। ऐसे में चारधाम और अन्य प्रमुख धार्मिक स्थलों के लिए दीर्घकालिक, वैज्ञानिक और पर्यावरण-संतुलित प्रबंधन योजना तैयार करना समय की आवश्यकता बन गया है। शासन और संबंधित विभागों को रिपोर्ट के आधार पर आवश्यक कदम उठाने की सिफारिश की गई है ताकि श्रद्धालुओं की सुविधा, पर्यावरण संरक्षण और धार्मिक स्थलों की गरिमा तीनों को संतुलित रखा जा सके।





