
राज्य सूचना आयोग ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में माना है कि लोक अधिकारियों की संपत्ति संबंधी जानकारी सार्वजनिक करने से उनकी और उनके परिवार की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। आयोग ने यह भी स्वीकार किया कि संपत्ति विवरण वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) का हिस्सा होने के कारण इसे सूचना के अधिकार के तहत सार्वजनिक नहीं किया जा सकता।
- संपत्ति का ब्योरा उजागर करने से सुरक्षा खतरा, आयोग ने माना तर्क
- लोक अधिकारियों की संपत्ति जानकारी पर निजता का संरक्षण
- RTI में मांगी गई संपत्ति सूचना देने से विभाग का इंकार बरकरार
- सूचना आयोग ने माना, संपत्ति विवरण गोपनीय अभिलेख का हिस्सा
देहरादून। राज्य सूचना आयोग ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान यह माना है कि सरकारी अधिकारियों की संपत्ति संबंधी जानकारी सार्वजनिक करने से उनकी निजता और पारिवारिक सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। आयोग ने सिंचाई विभाग के लोक सूचना अधिकारी द्वारा दिए गए तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि अधिकारियों की संपत्ति का विवरण उनकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) का हिस्सा होता है, जिसे केवल अधिकृत विभागीय अधिकारी ही देख सकते हैं। ऐसे में इस जानकारी को सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत सार्वजनिक करना उचित नहीं माना जा सकता।
मामला देहरादून निवासी विनय जायसवाल द्वारा दायर एक आरटीआई आवेदन से जुड़ा है। उन्होंने सिंचाई विभाग के एक अधिकारी की संपत्तियों का विवरण मांगा था। विभाग की ओर से लोक सूचना अधिकारी ने जानकारी देने से इनकार करते हुए कहा कि यह सूचना संबंधित अधिकारी के जीवन और सुरक्षा से जुड़ी है तथा इसके सार्वजनिक होने से उनके परिवार के सदस्यों की सुरक्षा को भी खतरा उत्पन्न हो सकता है। सूचना न मिलने पर आवेदक ने पहले प्रथम अपील और बाद में द्वितीय अपील दायर की। मामले की सुनवाई राज्य सूचना आयोग में हुई, जहां दोनों पक्षों के तर्कों पर विस्तार से विचार किया गया।
सुनवाई के दौरान आयोग के समक्ष यह तथ्य सामने आया कि संबंधित अधिकारी ने स्वयं अपनी संपत्ति संबंधी जानकारी सार्वजनिक किए जाने पर आपत्ति जताई थी। अधिकारी का कहना था कि उनकी व्यक्तिगत संपत्तियों का विवरण सार्वजनिक होने से उनकी निजता का उल्लंघन होगा और इससे परिवार के सदस्यों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। उन्होंने विभाग से अनुरोध किया था कि सुरक्षा और गोपनीयता के दृष्टिकोण से इस जानकारी को सार्वजनिक न किया जाए।
दूसरी ओर, अपीलकर्ता ने अपने पक्ष में तर्क दिया कि राज्य सरकार के 26 मार्च 2012 के शासनादेश के अनुसार सभी लोक अधिकारियों को अपनी संपत्तियों का विवरण प्रतिवर्ष अपने विभाग को उपलब्ध कराना अनिवार्य है। साथ ही यह भी प्रावधान है कि इन जानकारियों को स्व-प्रकटन (सुओ मोटू डिस्क्लोजर) के तहत विभागीय वेबसाइटों पर प्रकाशित किया जाए। ऐसे में संपत्ति संबंधी जानकारी को गोपनीय नहीं माना जा सकता। हालांकि, आयोग ने इस तर्क के बावजूद विभागीय पक्ष को महत्व दिया। आयोग के निर्देश पर लोक सूचना अधिकारी ने स्पष्ट किया कि अधिकारियों की संपत्ति संबंधी घोषणाएं उनकी वार्षिक गोपनीय चरित्र पंजिका (एसीआर) का हिस्सा मानी जाती हैं। इन अभिलेखों तक सामान्य सार्वजनिक पहुंच नहीं होती और इन्हें केवल निर्धारित विभागीय वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा ही देखा जा सकता है।
आयोग ने अपने निर्णय में माना कि यद्यपि शासनादेश के तहत संपत्ति विवरण उपलब्ध कराने का प्रावधान है, लेकिन संबंधित मामले में अधिकारी की निजता और सुरक्षा के पहलुओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आयोग ने यह भी माना कि संपत्ति का विस्तृत विवरण सार्वजनिक किए जाने से अधिकारी और उनके परिवार के सदस्यों की सुरक्षा संबंधी जोखिम उत्पन्न हो सकते हैं। इस फैसले को सूचना के अधिकार और व्यक्तिगत निजता के बीच संतुलन स्थापित करने वाले महत्वपूर्ण निर्णय के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला भविष्य में उन आरटीआई आवेदनों के लिए भी संदर्भ बन सकता है, जिनमें सरकारी अधिकारियों की व्यक्तिगत संपत्ति और निजी जानकारियों से संबंधित सूचनाएं मांगी जाती हैं।
राज्य सूचना आयोग के इस निर्णय के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि अधिकारियों की संपत्ति संबंधी जानकारी को हर परिस्थिति में सार्वजनिक सूचना नहीं माना जाएगा और ऐसे मामलों में निजता, सुरक्षा तथा प्रशासनिक गोपनीयता के पहलुओं का भी परीक्षण किया जाएगा।





