गाँव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति हैं “तिलबू”

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बालकृष्ण शर्मा

पतला दुबला शरीर, मध्यम ऊँचाई, सिर पर एक भी बाल नहीं, सारे शरीर पर वानरों कि तरह सफ़ेद बालों की भरमार, सप्ताह भर से नहीं बनी दाड़ी, निचले शारीर पर एक पुरानी मटमैली पड़ी सफ़ेद मरदाना धोती और ऊपरी शरीर पर एक पुरानी कमीज जिसके बटन टूट कर गिर चुके हैं I यही हुलिया है हमारे तिलाराम दादाजी का जो हमारे गाँव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति हैं और जिन्हें सारा गाँव ‘तिलबू’ (तिलाराम बूबू का लघु रूप, बूबू = दादाजी) कहकर पुकारता है I

उनका असली नाम तिलाराम भट्ट पुत्र मुसकदेव भट्ट है जैसा कि मरदम समारी (जनगणना) के रजिस्टर में दर्ज है I तिलबू की सही उम्र किसी को भी नहीं मालूम है, उन्हें खुद भी नहीं मालुम I पूछने पर कहते हैं चार बीसी (बीस गुणा चार याने अस्सी) से ऊपर ही हो गए होंगे I कहते हैं मैं जब सात साल का था तो सुनता था पूरी दुनिया में लड़ाई हो रही थी I पिताजी कहते थे लड़ाई लगी है, गाँव के सब लड़के जो अठारह साल के थे फ़ौज में भरती हो गए हैं, हमारा तो अभी सात साल का ही है, बड़ा होता तो भरती हो जाता I तिलबू की इन बातों से अंदाजा लगाया जाता है कि वे सन उन्नीस सौ चालीस में द्वितीय विश्व युद्ध के समय सात साल के थे अर्थात आज वे करीब सत्तासी साल के हैं I पर उन्हें देख कर कोई भी कहेगा कि बूबू अभी पछ्हत्तर से एक दिन ज्यादा नहीं हैं I

लेखक बालकृष्ण शर्मा का संक्षिप्त परिचय

इस उम्र में तिलबू अकेले रहते हैं I गाँव के बीचों बीच उनका एक कमरे वाला दो मंजिला घर है जो उनके पिताजी मूसकदेव जी ने शायद सन उन्नीस सौ तीस के भी पहले बनवाया था I नीचे के कमरे (गोठ) में घनश्याम लोगों के गाय बछड़े बंधे रहते हैं और ऊपर वाले कमरे में में तिलबू की आरामगाह हैं I उसी एक कमरे के एक कोने में उनका चूल्हा चौका है और दूसरे कोने में उनका बिस्तर लगा हुआ है I कमरे में रोशनी के लिए एक छोटी सी खिड़की है जिससे सबेरे के वक्त थोड़ी सी धूप उनके बिस्तर तक पहुँच पाती है I तिलबू के चौके में गिने चुने बर्तन है, एक लोहे कि कढ़ाई, दो छोटे पीतल के पतीले, दो थाली, दो कटोरी, दो गिलास ओर कलछी चम्मच I

एक एल्युमीनियम की केतली जरूर हर वक्त चूल्हे पर चढी रहने से काली पड़ गई है I दिन में कई बार चाय उबालने से और पानी गरम करने से केतली की यह दशा हो गई है I चूल्हे के बगल में ही एक फूँला (ताम्बे का कल्सा), लोहे की बाल्टी और बूबू का गुड़गुड़िया हुक्का जरूर रखा रहता है I दूसरे कोने में बिस्तर के नाम पर धान के पराल से भरा टाट का एक गद्दा और दो मोटी मटमैली चादर एक मोटा सा तेल लगा तकिया और एक बहुत मोटा भेड़ की ऊन का कम्बल है I दीवार पर खूँटी से लटकी बूबू की दो कमीजे और एक धोती, दो एक काली टोपियाँ और एक मंकी कैप जिसे बूबू सर्दियों भर सिर पर धारण किये रहते हैं I एक कोने में छोटा सा लोहे का संदूक रखा है जिसका रंग अब मालूम नहीं पड़ता है I बस यही बूबू की जायजाद हैI

तिलबू बड़े सबेरे उठ जाते हैं शायद चार बजे या हो सकता है तीन साड़े तीन बजे, और नौले (पानी के चश्मे) पर जाकर नित्य कर्म, स्नानादि से निवृत हो कर एक बाल्टी पानी भर कर अपने कमरे में आ कर चूल्हा जला लेते है I केतली में गरम पानी उबलने रख कर कमरे के तीसरे कोने में स्थापित भगवान् की बहुत सारी मूर्तियों को प्रणाम कर एक दीपक जला लेते हैं I बहुत देर तक पूजा अर्चना करके भगवान को परेसान करने में बूबू विश्वास नहीं करते I एक दीपक जला कर हाथ जोड़ कर प्रार्थना के दो शब्द बोल लिए, उनकी पूजा संपूर्ण हो जाती है I एक गिलास गरम पानी पीकर चाय बना लेते हैं I गाँव के लोगों के जगने तक बूबू का दूसरी बार चाय पीने का समय हो जाता है I अपने घर की चौखट पर बैठे बूबू पूरे गाँव पर नजर रखते है कौन काहाँ जा रहा है ,कौन क्या कर रहा है I किसी को भी कुछ भी गलत करते हुए देखते हैं तो झट से टोक देते हैं पर मजाल है कोई उनके टोकने का बुरा मान जाय I सारे गाँव के लोग उनकी इतनी इज्जत करते हैं जैसे वे उन सबके अपने बूबू (दादाजी) हों I हो भी क्यों नही अब हमारी पुरानी पीढी के बचे ही कितने लोग हैं I

तिलबू की जमीन पर बहुत से लोग खेती करते हैं और बदले में उन्हें आधा अनाज देते है I घनश्याम के परिवार वाले बूबू के गोठ में (घर के भूतल वाले कमरे में) अपनी गाय बैल बंधाते हैं और बदले में उन्हें रोज आधा सेर (लीटर) दूध देते है I तिलबू के साल भर खाने पीने का इंतजाम इसी तरह हो जाता है I उन्हें न तो किसी पेंसन की ज़रूरत होती है न किसी बेटे से पैसे माँगने की I उनके दो बेटे थे पर किसी कारण दोनों से उन्होंने रिश्ता तोड़ लिया था I पूछने पर कहते हैं हाँ दो बेटे थे होंगे कहीं परदेश में, पर मुझे उनसे कोई वास्ता नहीं है I दोपहर होते ही तिलबू के घर से धुँवा उठने लगता है अर्थात बूबू के दोपहर के खाने की तैयारी हो रही होती है I दोपहर ठीक एक बजे बूबू का लंच हो जाता है जैसे किसी कारपोरेट ऑफिस में लंच टाइम होता है I

दोपहर भोजन के बाद बूबू कुछ देर आराम करते हैं और ठीक चार बजे चाय पीकर अपना हुक्का ले कट घर की चौखट पर बैठ कर तम्बाकू के कश लेते हुए दिखाई देते है I गाँव के सभी लोग दिन ढलने पर ही खेत खलिहान के काम निबटा कर घरों को लौटते है I महिलायें पीठ पर हरी घास का गट्ठर लादे थकी मांदी घरों को लौटती हैं I बच्चे अपना खेल समाप्त कर नौले पर जाकर हाथ मुंह धोने लगते है I बहू बेटियां अपने अपने फूँले (तांबे की गागर) ले कर नौले से पानी भर कर घर को जाती हुई दिखाई देती है I बूबू अपने घर की चौखट पर बैठे सारा नजारा देखते रहते हैं I

लेखक बालकृष्ण शर्मा का संक्षिप्त परिचय



उधर शाम होते होते गोपालदत्त प्रधान जी के घर के आँगन में लोगों की महफ़िल जुटने लगती है I गाँव के सभी बुजुर्ग और सयाने दिन ढलते ही प्रधान जी के घर के प्रांगण में जमा होने लगते हैं I एक एक कर लोग आते जाते हैं I कुछ लोग मुड्डीयों पर बैठ लेते है कुछ प्रांगण के अहाते की दीवार पर बैठ कर महफ़िल का आनंद लेते हैं I प्रधान जी का घर बहुत बड़ा है I सुनते हैं बूढ़े प्रधान जी ने उन्नीस सौ छब्बीस में किसी ठेकेदार को ठेका दे कर यह तिमंजिला मकान बनवाया था I मुख्य द्वार पर लकड़ी पर नक्कासी करके सुन्दर दरवाजा बनाया गया है I झरोखों की भी नक्कासी देखते ही बनती है I मुख्य द्वार के ऊपर लकड़ी पर नक्कासी कर बनाई गणेशजी की प्रतिमा आज भी जीवंत लगती हैं I

शायद इसी प्रतिमा के लिए उत्तराखंड में “खोली का गणेश“ की उक्ति प्रचलित हुई होगी I आज भी मकान की शोभा जस की तस है I मकान क्या है पुरानी कारीगरी की एक धरोहर है I मकान के आगे बड़ा सा दालान है जिस पर बड़े बड़े पत्थर की पट्टियां बिछा कर सुन्दर सपाट पर्स तैयार किया गया है I प्रांगण के चारो ओर कम ऊँचाई का पत्थर का अहाता बनाया है जिस पर लोग बैठ सकें I बूढ़े प्रधान जी के समय से ही परिपाटी चली आ रही है शाम होते ही गाँव के सारे सयाने और बुजुर्ग याहाँ पर एकत्र होते हैं I अन्दर रसोई में चाय बनती रहती है और सब आने वालों को गिलास भर भर कर चाय पिलायी जाती है I



चाय के साथ साथ तम्बाकू की चिलम भी चलती रहती है I प्रधान गोपालदत्त जी प्रांगण के बीच में एक बड़ी सी कुर्सी पर बैठ कर लोगों की समस्या सुनते है और सारे बुजुर्ग चाय की चुस्की लेते हुए और तम्बाकू की चिलम का आनंद लेकर अपनी अपनी राय प्रस्तुत करते हैं I प्रति दिन होने वाली इस महफ़िल में तिलबू का विशेष स्थान है I दिन ढलते ही तिल बू अपनी छड़ी पकड़ कर ठीक समय पर आ कर अपनी कुर्सी पर बैठ जाते हैं I ईश्वर की कृपा से बूबू के आँख और कान दोनों ही सही सलामत हैं I थोड़ी याददास्त में कुछ कमी आयी है पर याद दिलाने पर झट से स्मरण हो आता है I गाँव की और गाँव के लोगों की दिन प्रति दिन कि समस्याओं का निवारण इसी महफ़िल में हो जाता है I प्रधान गोपाल दत्त जी भी बहुत ही बुद्धिमान और शांत स्वाभाव के व्यक्ति हैं I सारी समस्याओं को सुनकर बहुत धैर्य के साथ बातचीत करते हैं और सभी लोगों की राय ले कर अपनी राय रखते हैं I परन्तु अंतिम निर्णय तिलबू पर छोड़ा जाता है I गाँव के सबसे वयोबृद्ध व्यक्ति होने के नाते बूबू का निर्णय अंतिम निर्णय समझा जाता है I



उस दिन कचहरी में एक विशेष प्रसंग आया हुआ था I गणेश दत्त भट्टजी के जवान बेटे ने, जो नैनीताल में पढ़ कर वही एक कालेज में लेक्चरर हो गया है, पिता के द्वारा खोजी गई ब्राह्मण कन्या से विवाह करने से मना कर दिया था I मालुम हुआ है कि उसने अपने लिए नैनीताल में ही कोई राजपूत लड़की खोज रखी थी और उसी से विवाह करना चाहता था I बात बहुत गंभीर थी I उपस्थित सभी सयाने लोग बहुत चिंतित लग रहे थे I बहुत देर चुप्पी के बाद बिशन दत्त भट्ट बोल पड़े थे, आज तक तो हमारी जात बिरादरी में किसी ने ऐसा नहीं किया है, यह तो अनहोनी ही हो गई है I बिशनदत्त जी की बात सुन कर धर्मानंद जी बोल उठे भाई हमारा गाँव तो ब्राह्मणों का गाँव है, राजपूतों के घर की लड़की बहू बन कर आयेगी तो धरम करम तो भ्रष्ट हो ही जाएगा, फिर गणेशदत्त जी कुलदेवता के मंदिर में कैसे जायेंगे और कैसे इनके किसी काज में गाँव वाले शामिल हो कर भोजन करेंगें I



शिबदत्त जी बात को आगे बढ़ाते हुए बोले, बात तो सोलह आने सच है, अभी तक हमारा गाँव इस तरह की भ्रष्टत़ा से बचा हुआ है I दो तीन गाँव में लड़कों ने जवानी के नशे में ऐसी गलत हरकत करी है और पूरे गाँव को ख़राब किया है I एक गाँव में तो ब्राह्मण और राजपूत दोनों जात के लोग रहते हैं और उसी गाँव का एक ब्राहमण लड़का उसी गाँव की एक राजपूत लड़की को लेकर भाग गया और परदेश में जाकर विवाह कर लिया, माँ बाप देखते रह गए I बुजुर्ग दयाकृष्ण जी बोल पड़े, क्या ज़माना आ गया है, हमारे समय में तो बारह वर्ष की उम्र में ही लड़के का विवाह कर देते थे और फिर ऐसी किसी नौबत की आशंका ही नहीं होती थी I बिशन दत्त भट्ट जी ने फिर कहना शुरू किया, भाई यह सब आज की शिक्षा का प्रभाव है, लड़कों को धर्मशास्त्र की जगह समाज शास्त्र पढ़ाया जाता है, ज्यादा पढ़े लिखे लड़के ही इस तरह की हरकत कर रहे है I आगे बोले मैं तो कहता हूँ लड़कों को नैनीताल पढ़ने ही नहीं भेजना चाहिए I वाहाँ लड़का लड़की एक साथ पढ़ते हैं ,जात पात का कोई भेद भाव ही नहीं रखते I लडके का यज्ञोपवीत भी सही समय पर हो जाता और संध्या पूजा का कुछ ज्ञान होता तो उसे अपनी जात का कुछ लिहाज होता, पर आज कल तो यज्ञोपवीत कोई करना ही नहीं चाहता I तीस बत्तीस की उम्र तक लड़के ऐसे ही बिना धरम करम जाने डोलते रहते हैं I



गणेश दत्त भट्टजी सिर नीचे किये सब सुन रहे थे, बोलने को कुछ भी नहीं था I लोगों की बातें सुन कर वह बहुत अपमानित महसूस कर रहे थे I उनको अपने बेटे पर बहुत गुस्सा आ रहा था I कितने अरमान थे मन में, अपनी सारी सामर्थ्य लगा कर बेटे को कालेज भेजा था, आज तक गाँव में किसी लड़के ने एम. एस. सी. तक पढाई नहीं करी है I जब बेटे ने फर्स्ट डिविजन से एम.एस.सी. की परीक्षा पास करी थी तो कितनी खुशी हुई थी, सारे गाँव में मिठाई बांटी थी I घर पर बधाई देने वालों की क़तार लग गई थी I गाँव का एक एक व्यक्ति घर आकर बधाई देने को आतुर था I गाँव की महिलायें शेखर की माँ को बधाई पर बधाई दिए जा रही थी I आज ये कैसा दिन बेटे ने दिखा दिया, शर्म से सिर उठा नही पा रहा हूँ I कितने अरमान मन में पाले थे, सोचा था बेटा लेक्चरार हो गया है, अच्छे अच्छे घरों से शादी के रिस्ते आने लगेंगे, बड़े बड़े संपन्न ब्राह्मण परिवार अपनी लड़की देने को लालायित हो जायेंगे, बहुत धूम धाम से बेटे का विवाह करूंगा I अब क्या किया जाय सारे अरमान एक झटके में मिट्टी में मिल गए हैं I



गणेश दत्त भट्टजी सिर नीचे किये हुए ही किसी अन्धकार भरी दुनिया में विचरण कर रहे थे I उनका शरीर अवश्य प्रधान जी के प्रांगण में था पर मन कहीं दूर अँधेरी गुफा में भटक रहा था I प्रधान जी की प्रतिक्रिया और तिलबू के आदेश की भयावहता को सोच कर ही उनका कंठ सूख रहा था I पचपन वर्ष की आयु में पहली बार उनके सामने यह भयावह स्थिति आई थी I उनका मस्तिष्क जैसे फट पड़ना चाह रहा था I उन्हें पश्चाताप हो रहा था कि क्यों शेखर को नैनीताल कालेज पढ़ने भेजा, औरों के बेटों की तरह दसवी बारहवी पास करते ही फ़ौज में भरती हो जाता तो अब तक कम से कम हवालदार तो हो ही जाता, कौन जाने जे.सी ओ. भी बन जाता I अब तक तो कभी उसका विवाह किसी ब्राह्मण कन्या से करके मैं भी मुक्त हो गया होता I आज यह भयानक स्थिति तो सामने नहीं आती I उन्हें बेटे को कालेज पढ़ाने के निर्णय पर बहुत अफासोस हो रहा था I लोगो की बातें उनके कानों में इस तरह पड़ रही थी मानो घड़ों ठंडा पानी उनके ऊपर डाला जा रहा हो I किसी तरह अपने कलेजे को मजबूत करके सब सुन रहे थे और मन में विचार आ रहा था काश बेटा ही नहीं होता तो आज यह दिन तो नहीं देखना पड़ता I



गणेश दत्त भट्टजी गहन सोच में डूबे थे कि प्रधान जी की आवाज सुनाई दी I बहुत ही सौम्य और स्पष्ट आवाज में वे बोल रहे थे I भाइयो मामला बहुत ही जटिल है, पर हमें गणेश दत्त भट्टजी और उनके परिवार को ध्यान में रख कर विचार करना है I इसमें भाई गणेश दत्त की कोई गलती मुझे नहीं लगती है I आज ज़माना बदल गया है I बच्चे पढ़ लिख कर बड़ी बड़ी जगहों पर जा रहे है I हमारे जिले के बहुत से लड़के डाक्टर इंजीनियर बन कर बिदेशों में जा चुके हैं I आज हमारे पाहाड़ के कितने ही परिवार बड़े बड़े शहरों में जाकर बस गए हैं, उनके अब पाहाड़ लौटने के कोई आसार नहीं है, शहरों में कितने ही परिवारों के लड़कों ने अंतरजातीय विवाह कर लिए हैं और उनके परिवार ने उन्हें स्वीकार कर लिया है I हमारे ही गाँव के कितने परिवार शहरों में रह रहे हैं, हो सकता है उनमें से भी किसी के बच्चों का अंतरजातीय विवाह हो गया हो I शेखर भी आज लेक्चरर है कल प्रोफ़ेसर ओर फिर भविष्य में किसी कालेज का डीन बन जाएगा, उसे अब गाँव में कब रहना है, उसका जीवन तो अब शहरों में ही बीतेगा I इसलिए मेरे विचार से हमें उसके अंतरजातीय विवाह करने पर कोई एतराज नहीं होना चाहिए I उसे वहीं नैनीताल में ही विवाह कर लेना चाहिए I हो सकेगा तो गाँव से हम लोग भी विवाह में शामिल होने चले जायेंगे I फिर हमें तिलबू का भी फैसला सुन लेना चाहिए I



तिलबू अब तक चुप चाप बैठे सब की बातें बहुत ध्यान से सुन रहे थे I गणेशदत्त जी को प्रधान जी की बातों से बहुत शांत्वना मिली थी I उनके मन मस्तिष्क में जैसे कुछ ठंडक आयी थी I परन्तु तिलबू के कड़क मिजाज और उनकी धार्मिक आस्था के चलते उनसे किसी प्रकार की रियायत की आशा नहीं थी I गणेश दत्त जी ने सुना था कि तिलबू ने अपने दोनों बेटों को इसी प्रकार की हरकत के लिए घर से निकाल दिया था I प्रधान जी ने भी अंतिम फैसला तिलबू पर ही छोड़ दिया थाI



तिलबू ने चिलम का आखीरी कश खींच कर चिलम नीचे रख दी और बोलना शुरू किया I बोले, मेरे लिए यह किस्सा नया नहीं है I आज से पैतालीस वर्ष पहले यही काम मेरे बेटे ने किया था I मेरे दो बेटे थे I बड़ा वाला चंदर जब शहर में रह कर शराबी जुआरी हो गया तो मैंने उसे घर से ही निकाल दिया था I वह आज तक नहीं लौटा है I दूसरा रवीन्द्र, पढ़ लिख कर दिल्ली में नौकरी करने लगा था I बेटे को अच्छी कंपनी में नौकरी मिल गयी थी I मैं भी बहुत खुश था और बेटे के विवाह के लिए लड़की खोजने लगा था I परन्तु मेरा दुर्भाग्य, एक दिन बेटे ने घर आकर बताया कि उसने अपने विवाह के लिए लड़की स्वयं खोज रखी है I उसने काहा कि लड़की उसी की कंपनी में नौकरी करती है और उसका परिवार भी दिल्ली में ही रहता है I

ज्यादा पूछताछ करने पर बेटे ने बताया कि लड़की के परिवार वाले क्षत्रिय हैं और अल्मोड़ा जिले के किसी गाँव के रहने वाले हैं I बेटे की बात सुन कर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई थी I पैंतालीस साल पहले हमारे गाँव के उस समय के बड़े बूढ़ों को यह बात मालुम हो जाती तो मेरा गाँव में रहना मुस्किल हो जता I उस समय का माहौल ही अलग था I हम ब्राह्मण लोग धोती पहन कर संध्या पूजा करके ही रसोई में बैठ कर भोजन करते थे I बाहर बिना धोती पहने भोजन कर लिया तो अछूत माने जाते थे I नित्य कर्म जनेउ संध्या पूजा नियम से होते थे I हम लोग भूल से भी क्षत्रिय लोगों की रसोई में खाना नहीं खा सकते थे I बेटे के फैसले ने मुझे बहुत आहात कर दिया था I मैंने बेटे को बहुत तरह से समझाया पर वह मानने को तैयार नहीं था I



मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था I एक ओर बेटे का मोह और दूसरी ओर समाज की मर्यादा का डर I उस समय मैं जवान था और मुझे बहुत कठोर फैसला लेना पड़ा था I मैंने अपने दिल पर पत्थर रख कर छोटे बेटे को भी घर से बेदखल कर दिया I बेटे को साफ़ शब्दों में बता दिया कि अब उसका इस गाँव में कोई हक़ नहीं है, वह जाकर अपनी मर्जी से विवाह कर ले और और जाहाँ चाहे वहाँ रहे पर भूल कर भी इस गाँव में पैर न रखे I एक वो दिन था और एक आज का दिन है मैंने बेटे की सूरत नहीं देखी है I ऐसा नहीं है की मुझे अपनी संतान की याद नहीं आती है पर बेटा भी कठोर ह्रदय वाला निकला, एक बार भी मुड़ कर पिता की खबर नहीं ली I

सुनता हूँ कि अब तो उसके भी बाल बच्चे सब बड़े हो कर नौकरी चाकरी में लग गए है, भरा पूरा परिवार है, सुन कर दिल को सूकून मिलता है I शायद मेरे ही भाग्य में एकाकी जीवन लिखा होगा I प्रधान जी ने जो काहा है वह आज के माहौल में सत्य है, हमें किसी के परिवार को तोड़ कर चोट नहीं पहुंचानी चाहिए I आज दुनिया बहुत आगे बढ़ गई है, बच्चे पढ़ लिख कर काहाँ से काहाँ पहुँच गए हैं I बेटा गणेश दत्त तुम खुश हो कर बच्चो का विवाह कर दो और हम सब आशीर्वाद देने के लिए हाजिर हो जायेंगेI



तिलबू का फैसला सुन कर सभा में उपस्थित सभी लोग दंग रह गए I गणेश दत्तजी के तो मानो सिर से बहुत बड़ा बोझ उतर गया था I वह दौड़ कर गए और तिलबू के पैरों में झुक कर धन्यवाद करने लगे I तिलबू ने उन्हें उठा कर गले से लगा लिया और बोले पगले मैंने तो अपने किये का प्रायश्चित किया है I तुम सब लोगों को मेरा आशीर्वाद है खूब फलो फूलो और सदा खुश रहो I


¤  प्रकाशन परिचय  ¤

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बालकृष्ण शर्मा

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बी-006, रेल विहार सीएचएस, प्लॉट नं. 01, सेक्टर 04, खारघर, नवी मुम्बई (महाराष्ट्र)

Publisher »
देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड)

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