हमारे देश की अदालतें इंसाफ का मंदिर

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सुनील कुमार माथुर

शिक्षण संस्थान शिक्षा के पावन मंदिर कहें जाते हैं जहां से शिक्षा प्राप्त कर विधार्थी अपने ज्ञान व हुनर से समाज व राष्ट्र का उत्थान व विकास करते हैं । शिक्षा ही वह माध्यम है जिसके जरिए विधार्थी अज्ञानता रूपी अंधकार से ज्ञान रुपी प्रकाश की ओर जाता हैं । शिक्षा ही विधार्थियो का श्रेष्ठ आभूषण है । शिक्षा विधार्थियो को आत्म निर्भर बनाने मे अपनी महत्ती भूमिका अदा करती हैं लेकिन वर्तमान समय मे शिक्षण संस्थानों में ऐसे लोगों ने प्रवेश कर लिया है जिन्होंने शिक्षा के इन पावन मंदिरों को कलंकित करने में कोई कोर कसर नहीं छोडी है।

आज शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों द्वारा छात्र-छात्राओं के साथ बर्बरता पूर्वक मारपीट व बलात्कर की घटनाओं के समाचार समाचार पत्रों में पढते हैं तो सिर शर्म के मारे झुक जाता हैं । बात तब और भी दु:खदायी हो जाती हैं तब ऐसी घटिया हरकतों के बाद वहां कार्यरत शिक्षिकाओं ध्दारा हवश के भूखें भेडियों का साथ दिया जाता हैं और वे साक्ष्यों को मिटानें मे भी सहयोग करती हैं । जब – जब ऐसी घटनाऐं सामने आती है तो लगता है कि शिक्षक शिक्षक से हैवान क्यों बन रहा हैं । ऐसे चंद शिक्षकों की वजह है शिक्षा के पावन मंदिर कलंकित हो रहें हैं फिर भी इन्हें फांसी क्यों नहीं दी जाती है।

अदालतें हमारे देश में इंसाफ के मंदिर है । लेकिन आज अदालतों में मुकदमे बढते ही जा रहें है । आज हर छोटी सी बात पर लोग अदालत में चले जाते है । न्यायालयो में स्टाफ की भारी कमी भी एक मुख्य कारण है। कुछ अदालतों के अधिकारियों के पास प्रशासनिक कार्य भी होता हैं जिसके कारण उन्हें मिटिगों में भी जाना पडता है जिसके कारण अदालतों का कामकाज प्रभावित होता है व तारीख पर तारीख दी जाती हैं । इस वजह से पीडित पक्षकार को समय पर न्याय नहीं मिल पाता है व अदालतों में बढती मुकदमों की संख्याओं को देखते हुए और अदालतों का खोला जाना नितांत आवश्यक है व वर्तमान अदालतों में जजों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए । तभी पीड़ित पक्षकारों को समय पर सस्ता व शीध्र न्याय मिल पायेगा । अदालतों में मुकदमों की संख्या बढने का एक कारण यह भी है कि लोगों का आज भी हमारी न्याय व्यवस्था में पूर्ण आस्था और विश्वास है ।

आज देश में जो अराजकतापूर्ण माहौल बन रहा हैं वह चिंताजनक बात हैं । लोगों का इतना नैतिक पतन हो गया है जिसकी सपने में भी कल्पना नहीं की जा सकती । इसका मूल कारण युवापीढी मे आदर्श संस्कारों का अभाव है । आज शिक्षण संस्थानों में केवल किताबी ज्ञान ही दिया जा रहा है कोई व्यवहारिक ज्ञान एवं आदर्श संस्कार नहीं । उधर टूटते परिवारों के कारण भी माता पिता के पास इतना समय नहीं हैं कि वो अपनी संतान को आदर्श संस्कार दे सके । उन्हें तो कामकाज व क्लबों से ही फुर्सत कहां है । संस्कार कोई बाजार में तो नहीं बिकते की जब चाहें तब खरीद लिया ।

आज की शिक्षण संस्थान बच्चों को किताबी ज्ञान देकर केवल शिक्षित बेरोजगारों की फोज ही बढ़ा रही हैं । उधर सरकार अपराधियो के हाथों की कठपुतली बनकर अपने ही पुलिस कर्मियों का मनोबल तोड रही हैं यह कैसी विडम्बना है । ऐसे में हम कैसे सुरक्षित समाज व राष्ट्र की कल्पना कर सकते है । सरकार आत्म निर्भर भारत बनाने के चक्कर में जनता जनार्दन को नीम्बू की तरह निचोड़ कर रख दिया।‌

लोक लुभावने भाषणों से जनता का भला होने वाला नही है। आज जनता को सुरक्षा, मंहगाई से राहत व आदर्श शिक्षा व स्वास्थ्य, पानी, बिजली, सही सडके व नि:शुल्क चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधाएं चाहिए न कि चिकनी चुपड़ी बातें । अगर कुछ सालो के लिए विकास की योजनाओं को विराम दिया जाये तो देश का कुछ भी बिगडने वाला नहीं है ।

आज जरुरत है तो मंहगाई को कम करने की । चारित्रिक व नैतिक शिक्षा व आदर्श संस्कारों की ! समस्या तो समाधान चाहती है न कि दलगत राजनीति । हमारे बड़े बुजुर्ग कहते है कि पहलें रामराज था । लोग अपने घरों में ताले भी नहीं लगाते थे । लोग बडे ही ईमानदार थे । वे दयावान व चरित्र वान थे तो फिर आज हिंसा , चोरी , डकैती , मारधाड , खून खराबा ; भ्रष्टचार , नारी पर बढते अत्याचार की घटनाऐं क्यों बढ रही हैं और सरकार कब तक हाथ पर हाथ धरे बैठी रहेगी ।

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