स्यांल़  रवैं रवैं की हरचि गैं नी

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रचना राजेश ध्यानी “सागर”

स्यांल़  रवैं रवैं की हरचि गैं नी
कूणीं फुंगुणीं उजणीं गैनी
थाडों म कंडली क बुज्यां
जमीं गीं
भितरीं क क्वरां झैंणि गैं नी।

पंदेंरी ह्वें ग्यें जमना छुई
घसेंरी द्वी चार रें गीं
भैंसु भी सकैंन्दु नी ,
दूधा कि पणकताल ह्वैं ग्यै।

ट्वपली भि दिखैंदी कम
सुगंरों की भरमार ह्वे ग्यें।

घाट म लिजाणां कु
गाड़ी बुक हूंणीं च
लाखुणं छोडी दारू की
चम सेटिंग हूंणीं च।


¤  प्रकाशन परिचय  ¤

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राजेश ध्यानी “सागर”

सम्पादक, काफ़ल एवं कवि

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Publisher »
देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड)

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