कहानी : प्रतिबिंब की परछाई

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वीरेंद्र बहादुर सिंह

आंखें बंद करते ही चमकते कांच से जड़ी गगनचुंबी इमारते दिखाई देने लगतीं। दूसरा और कुछ नहीं… खनकते अमेरिकी डालर की खनक अमरीश के कानों में इस तरह गूंज रही थी कि विधवा मां, पत्नी सुनीता, बेटा दीप और छोटी बेटी रूपल, जिसे वह “मेरी रुपहली गौरैया’ कह कर संबोधित करते थे, सभी को अपने वतन भारत में छोड़ कर, डालर कमाने की लालच में सालों पहले अमेरिका आ गए थे।
मां, पत्नी और दोनों बच्चों की यादें परेशान त करती थीं, पर वह स्थिति में नहीं थे कि सभी को अपने पास अमेरिका पास बुला लेते। और अगर वह भारत वापस चले जाते तो फिर शायद इस चमकते देश में लौट नहीं सकते थे।

तमाम कोशिशों के बावजूद अमेरिका ने उसके परिवार का वीजा देने से मना कर दिया था। तमाम उलझनों के बावजूद सोने का पिंजरा छोड़ने का मन नहीं हो रहा था। धीरे-धीरे अमेरिका की हवा उन्हें भाने लगी थी। ‘आखिर यह मजबूरी परिवार वालों के लिए ही तो है न?’ विचारों की ठंडी लहर आ कर मन को शांति पहुंचाने लगी थी।

फोन पर एकदूसरे की आवाज सुन कर मन को संतोष मिल जाता था। ‘मां की तबीयत खराब है’ या फिर ‘दीप गणित में फेल हो गया है’ या फिर आज रूपल का बर्थ-डे मनाया गया’ जैसे समाचार सुन कर अमरीश को ‘अकेलापन महसूस होता है’, ‘तुम्हारे हाथ की रोटियां और दाल का अभाव सालता है’ या ‘काम की व्यस्तता के बीच फालतू समय नहीं मिलता’ जैसी बातें फोन पर कर के मन को संतोष मिल जाता। नियमित होने वाला फोन वार-त्योहार पर होने लगा। समय व्यतीत होने के साथ यह सिलसिला भी अनियमित होता गया।

‘इंडिया कब आओगे?’ सुनीता द्वारा पूछे जाने वाले एक के बाद एक सवालों के संतोषजनक जवाब न मिलते। अब तो गले से बाहर निकलती उच्छवास के साथ यह सवाल भी निकलती गरम हवा में बिखर गया था। कानूनी परेशानियां समझाते हुए अमरीश अपनी लाचारी प्रकट करता। दूसरा कर ही क्या सकता था? बहती नदी अवरोधों को तोड़ती अपना मार्ग खोजते हुए आगे बढ़ जाती है, उसी तरह हर कोई अपने जीवन में कलकल करता हुआ आगे बढ़ता जाता है, व्यवस्थित होता जाता है। जैसे-जैसे साल बीतते गए, वेसे-वैसे अमरीश अमेरिका में ‘एडजस्ट’ होते गए और पत्नी, मां तथा बच्चों से भरा घर उनके बगैर आदी हो गया। भौतिक अंतरमन में खुदता खाईनुमा गड्ढा बढ़ता गया।

एक दिन अमरीश को न जाने क्यों नींद नहीं आई। मन में विचार आया कि ‘यह भी कोई लाइफ है? पैसा कमाने की लय में सालों से वह यहां सात समुंदर पार पड़ा है और उसका परिवार वहां। ओह धत्… उसका भी कैसा बैडलक है कि वहां बेटे की शादी हो गई और वह अपने ही घर शुभ प्रसंग को ब्लेसिंग्स देने के लिए रूबरू हाजिर न रह सका।

‘बेचारी सुनीता कुछ बोलती नहीं। पर उसकी गैरहाजिरी उसे किस तरह सालती होगी? बस, अब बहुत ही गया, बेटा सेट हो गया है। उसकी लाडली रूपल गौरैया भी कर उड़ कर ब्याह के लायक हो जाएगी। नाउ इट्स इनफ। बहुत डालर जमा कर लिया। बहुत हो गया, अब घर जाना है। यह देश कितना भी अच्छा हो, पर है तो पराया ही।

भारत जाने के निर्णय के साथ ‘आगे के लिए देखा जाएगा’ का निर्धारण हो गया। अमरीश ने बैग भर लिए। भरी गई बैगों में परिजनों का स्पर्श पाने की झंखना और अपनी खुद की आंखों से सभी को सालों बाद प्रत्यक्ष देखने का उत्साह भी छलक उठा। वतन के लिए उड़ान भर रही फ्लाइट के साथ अणरीश की खुशियां भी ऊंची उड़ान भर रही थीं।



खुशनुमा दिन की उगती सुबह दरवाजे पर “दीप” की तख्ती पढ़ कर अपने घर की डोरबेल बजा कर अमरीश दरवाजा खुलने की प्रतीक्षा में बैग साइड में रख कर अदब से खुशी-खुशी खड़ा हो गया। दरवाजा नहीं खुला तो उन्होंने फिर बेल बजाई। ऊब की बांग पुकारते हुए बगास के साथ दरवाजा खुलते ही हैरानी से भरी अंजान दो आंखों ने उन्हें धमकाते हुए सवाल किया, “सुबह-सुबह किस से काम है? यह क्या है, कितनी बार बेल बजा दी?”

प्यार भरे स्वागत के बजाय इस तरह के सवाल सुन कर स्तब्ध अमरीश ने देखे गए फोटो से बहू को पहचान लिया। उन्होंने हकलाते हुए कहा, “मैं… मैं पापा। सुनीता कहां है? दीप क्या कर रहा है? मेरी लाडली रूपल को बुलाओ। तुम… तुम रीना हो न?”



“पा… पापा, अरे आप?” जाना-सुना स्वर पहचानने के बाद अब स्तब्ध होने की बारी रीना की थी। कोमल चेहरे पर पढ़ते सवालों में हैरानी भर आई। नाइट गाउन व्यवस्थित करते हुए समय के अनुसार उसने अमरीश के हाथ से बैग ले कर उनके पैर छुए। बदल गई स्थिति को ताज्जुब से निरखते हुए अमरीश को अपने ही घर में अंजान की तरह पूछना पड़ा, “मेरा बेडरूम?” मां, पत्नी, बेटा-बेटी कहां हैं? इन सवालों के जवाब में रीना बोली, “दादी जी मंदिर दर्शन करने गई हैं। मम्मी जी योगा क्लास जाने के लिए अभी-अभी निकली हैं। दीप मार्निंग वाक करने गया है और रूपल तो… पहले यह बताइए कि चाय रखूं या काॅफी?”



“मैं आराम से सभी के साथ बैठ कर चाय-नाश्ता करूंगा।” कह कर अमरीश सोफे पर बैठ कर जूता-मोजा उतारने लगे। जूता-मोजा उतारते हुए उन्होंने घर में चारों ओर नजर डाली। यही अपना घर था। यही दीवारें, पर बहुत कुछ बदला-बदला लग रहा है। दीवारों पर नया रंग चढ़ गया था। दीवानखंड में रखा फोटो बदल गया था। उनका असली बेडरूम अब दीप का था। सुनीता और मां का अब अलग कमरा था।



वह इस बात को ले कर परेशान हो गया कि नोएडा के टू बीएचके घर में वह अपना सामान कहां रखेगा। बेटी रूपल की बात बहू ने बीच में ही काट दी थी। सोच में डूबा उत्सुक मन पत्नी के आने की राह देखते हुए बारबार दरवाजा खुलने की प्रतीक्षा में बेचैन था। करीब घंटे भर बाद सभी के सानंदाश्चर्य के बीच एकदूसरे को भेंटने के बाद ब्रेकफास्ट टेबल पर पत्नी के हाथ का गरमागरम पराठा खाते हुए अमरीश ने कहा, “रूपल नहीं दिखाई दे रही है? कहां गई मेरी लाडली रूपाली गौरैया?”

आखिर दिल में घुट रही बात होठ पर आ ही गई। पति की बात को टालते हुए सुनीता ने कहा, “सब कुछ बताती हूं। पहले फ्रेश हो कर आराम कर लो।”

“अरे आराम ही तो कर रहा हूं।” अमरीश ने थोड़ा चिंतित स्वर में कहा।



पत्नी ने कोई जवाब नहीं दिया तो उनकी चिंता बढ़ गई। दीप नौकरी पर चला गया। बहू दोपहर को पारिवारिक किटी पार्टी में चली गई। सुनीता को सहेली के यहां उसके पौत्र को खेलाने के लिए खुशी पार्टी में हाजिरी देने के बाद एक रिश्तेदार के यहां जाना था। मां भी हर सप्ताह होने वाली भजन-कीर्तन में चली गई। मां ने दरवाजा बंद करते हुए कहा था, “बेटा, तू निश्चिंत हो कर आराम कर। अब तुझे कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा।”

“उफ्फ… कितनी गरमी है।” बड़बड़ाते हुए अमरीश ने मां की चारपाई बाहर हाॅल में डाल कर एसी चला दी और सोने की तैयारी करने लगा। ‘मां को एसी की आदत है, कुछ दिनों की ही तो बात है, चला लेंगी।’ उन्होंने मन ही मन कहा।



अमरीश जब उठे तो घर में जलती ट्यूबलाइट से उसे पता चल गया कि रात हो गई है। पेट में चूहे कूद रहे थे। पर घर में अभी खाना नहीं बना था। उन्होंने रीना से चाय बना कर देने को कहा। उसके हावभाव से अमरीश को समझते देर नही लगी कि उनका इस समय चाय बनाने के लिए कहना रीना को अच्छा नहीं लगा।

“इस समय चाय?” पूछ कर वह चुप हो गई। शाम को खाने में बवाल हो गया। तली पूड़ी और मिर्च-मसाला से भरपूर सब्जी बड़ी मुश्किल से उसके गले उतरी।



“मैं ने सालों से तला-भुना खाना छोड़ दिया है। कोलेस्टरोल युसी।” अमरीश ने कहा तो, पर दूसरी अन्य बातों में उसकी आवाज दब कर रह गई। आते ही किचकिच करना ठीक नहीं है, यह सोच कर वह चुपचाप बैठे रहे। ‘कल सुनीता को सब समझा दूंगा’, मन ही मन उन्होंने फैसला कर लिया। जबकि अभी उन्हें खुद ही बहुत कुछ समझना बाकी था, यह उन्हें कौन समझाता? अपने-अपने बनाए रास्ते पर चलने वाले अब उनके बताए रास्ते पर कैसे चल सकते थे। क्योंकि अब सभी के रास्ते अलग हो चुके थे। उन्हें लगा कि परिवार के पजल में कहीं एक टुकड़ा खुट रहा है। जिसमें वह फिट नहीं बैठ रहे हैं।

दीप के बेडरूम के खुला दरवाजे में से रीना बहू के कहने की आवाज उसने सुनी। बहू दीप से पूछ रही थी, “पापा जी कितने दिन यहां रहेंगे। उन्हें यहां की पाॅल्यूशन वाली हवा रास नहीं आएगी।” और बाहर छींक रहे अमरीश इस सवाल का जवाब क्या, कैसे और किस तरह दें कि बहू को अच्छा लगे, मन ही मन सोचने लगे।



रात को सुनीता को अपनी ओर खींचने के लिए उन्होंने हाथ बढ़ाया तो थकी, निरुत्साहित आवाज उनके कान में पड़ी, “भई पूरा दिन भागदौड़ करती रही, दोपहर को तो तुम ने सो लिया है, अब मुझे सोना है तो तुम्हें नींद नहीं आ रही है। अब थोड़ी देर आराम से सो लेने दो। उसके बाद तो मुझे आपके नसकोरे का बेसुरा संगीत सुनना ही पड़ेगा। मुझे सुबह जल्दी मुझे योगा क्लास में जाना होता है। ”

और सुनीता अपना हाथ खींच कर करवट बदल कर सो गई। अगले दिन सुबह सभी अपने-अपने नित्यकर्म में लग गए। नौकरी पर जाने से पहले दीप ने पूछा, “ऐसा है पापा मुझे नौकरी के सिलसिले में बाहर जाना होता है। इसलिए मैं चाहता हूं कि आपकी तारीख के हिसाब से मैं बाहर जाने का प्रोग्राम बनाऊं।”



अमरीश थोड़ा परेशान होकर कहने जा रहे थे कि ‘मैं तो विदेश छोड़ कर हमेशा के लिए यहां आ गया हूं, अब यही मेरा घर है।’ पर समय के हिसाब से सावधानी बरतते हुए उनके मुंह से निकला, “तुम्हीं सब लोगों के लिए ही मैं उतनी दूर कमाने गया था। रोजाना घटती तारीखों के साथ मैं भी थोड़ा-थोड़ा घटता चला गया। कितनी कीमत चुकाई, कितने कष्ट सह कर वहां रहा, तुम्हीं सब के लिए और तुम लोग…आज मेरे घर में ही मुझसे पूछा जा रहा है कि कितने दिन रहोगे? तुम लोगों ने मुझे मेरी कीमत समझा दी, पर…” वह बस इतना ही कह सके। ‘जरूरत पूरी करने वाले की ही अब जरूरत नहीं रही।’ यह कहने के बजाय वह चुप ही रहे।

अमरीश ने शाम को मां के पास जा कर पूछ ही लिया, “मां रूपल कहां है? आखिर कोई मुझसे कुछ बताता क्यों नहीं?”

“सुनीता ने तुम से कुछ नहीं बताया?” मां की अनुभवी आवाज सहज ही कांप उठी।



“वह तो किसी विजय कुमार के साथ उसके घर बिना ब्याह किए ही रह रही है। उसे क्या कहते हैं लिव इन में। लड़का भी गैर जाति का है और उसकी उम्र भी ज्यादा है। लड़का क्या है? उसे तो पुरुष कहा जाएगा। कह रही थी कि एक साथ काम करते-करते प्यार हो गया था उससे। पैसे वाला है, पर उसके पैसे का क्या करना? खाना है? इस से खराब बात तो यह है कि वह बाल-बच्चेदार है। जब इस बात का पता चला था तो दीप और सुनीता बहुत नाराज हुए थे। बहुत समझाया, पर तुम्हारी लाडली जरा भी नहीं पसीजी। आखिर मजबूर हो कर तमाचा मार कर घर से यह कह कर निकाल दिया कि अब इस घर से तुम्हारा कोई रिश्ता नहीं है। अब भूल जाओ हम सब लोगों को। उसे ले कर महीनों तक यह रामायण चलती रही, जिद्दी रूपल आवेश में जो कपड़े पहने थी, वही कपड़े पहने घर छोड़ कर चली गई।” मां सजल नेत्रो से कह रही थी, “अब तुम राम बन कर उस रावण के शिकंजे से उसे छुड़ा सको तो बड़ी कृपा होगी।”



कानों को विश्नास न हो, इस तरह यह सब सुन कर अमरीश हिल गए। उसी रात उनकी बेटी जहां रहती थी, उसकी सहेली से उसका पता ले कर वह उसके यहां पहुंच गए। प्यारे पापा को अचानक दरवाजे पर खड़ा देख कर हतप्रभ रूपल एकदम से उनके गले लग कर बोली, “पापा, आप यहां…?”

“कैसी है मेरी लाडली? घर चलो, मैं तुम्हें ले जाने आया हूं। मुझसे नाराज नहीं हो न?” एकदूसरे को ताक रही चार आंखें मन भर कर धार से बह रही थीं।



थोड़ी देर में स्वस्थ हो कर अमरीश से अलग होते हुए रूपल बोली, “पापा, अब मैं छोटी बच्ची नहीं रही। स्कूल, कालेज, समाज में सभी मेरी पीठ पीछे कहते थे कि लगता है, इसके पिता ने तो अमेरिका में दूसरा ब्याह कर लिया है। इसीलिए तो वापस नहीं रहा है और बाल-बच्चों को वहां बुलाता नहीं है। वहां किसी गोरी मेम के साथ मौज कर रहा है। पापा अपना सत्य आप जानो और मेरा सत्य यही है।”

इतना कहते-कहते रूपल का चेहरा गंभीर हो गया और आंखों में अचानक घृणा उतर आई। उसने आगे कहा, “जब मेरे ब्वॉयफ्रेंड ने मुझे धोखा दिया तब आप की इस लाडली को रोने के लिए एक मजबूत कंधे की जरूरत थी। तब आप नहीं थे। उस समय विजय जी ने मुझे सहारा दिया। मैं प्यार, वात्सल्य के लिए तरस रही थी। उस समय आप मेरे पास नहीं थे पापा। सधवा होते हुए भी विधवा जैसी मेरी मां जब भी कोई जरूरत होती थी, अकेली पड़ जाती थी, तब आप कहां थे पापा? आप की यह लाडली आप का बिखरा पड़ा घोषला छोड़ कर उड़ गई पापा, तब उसे अपना घोषला बनाने के लिए विजय जी मिले। उन्होंने मुझे सहारा दे कर संभाला। मेरे बिखर चुके प्यार को बटोर कर संभाला। आप तो हमें छोड़ कर चले गए, पर मैं उन्हें कदापि नहीं छोड़ूंगी। उन्हें मेरी जरूरत है।”



लगातार बोल रही रूपल को अमरीश अपलक ताकते हुए बोले, “पर वह तो शादीशुदा है?”

“उससे मुझ पर कोई फर्क नहीं पड़ता पापा। आप लोग मुझे त्यागो, उसके पहले ही मैं ने आप लोगों को त्याग दिया।”



रूपल के कड़वे शब्द सुन कर अमरीश स्तब्ध रह गए। उनकी प्यारी लाडली बेटी ने उन्हें गरम सरिया से दाग दिया हो, इस तरह वह छाती दबा कर दरवाजे पर ही गिर गए। सिर चौखट से टकराया, इसलिए वहां फट गया। वहां से खून बहने लगा। उसी समय उनका फोन बजा। रूपल ने फोन उठाया तो दूसरी ओर से एक मधुर आवाज सुनाई दी, “हाय देयर, डेजी हियर। ह्वेन विल यू बी बैक डियर? आई सैल बी वेटिंग…”

रूपल ने तुरंत वह फोन काट कर मां को फोन लगाया, “पापा यहां आए थे गिर पड़े। डाक्टर के पास ले जा रही हूं।”



आघात न सहम कर पाने से वाचा गंवा चुके अमरीश कोमा मे चले गए। उन्हें अस्पताल के आईसीयू में भरती कराना पड़ा। चढ़ रहे खून की बोतल को देख कर वह मन ही मन सोच रहे थे कि उनके अपने ही खून ने जवाब दे दिया। क्या स्वभाव भी वारिस में मिलता है?

नर्स ने इंजेक्शन दिया तो वह बेहोश हो गए।



“वह तो कोई विजय कुमार के साथ बिना शादी किए ही उसके घर रहती है। उसे क्या कहते हैं, लिव इन में रहती है। लड़का दूसरी जाति का है और उसकी उम्र भी ज्यादा है। लड़का तो क्या है, पुरुष है। कहते हैं एक साथ काम करते-करते दोनों में प्यार हो गया था। पैसे वाला है, पर ऐसे पैसे का क्या करना? खाना है? इससे भी खराब बात यह है कि वह बाल-बच्चेदार है।” मां के ये शब्द अमरीश के दिमाग में हथौड़े की तरह बज रहे थे।

वह मां बोल रही थी या डेजी की मदर? अमरीश को सामने से आ रही दोनों आवाजें एकदूसरे मे मिलती लग रही थीं। एक परछाई उन्हें आवाज दे कर कुछ कहना चाहती थी।


¤  प्रकाशन परिचय  ¤

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वीरेंद्र बहादुर सिंह

लेखक एवं कवि

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देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड)

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