
यह आलेख लेखक की आध्यात्मिक यात्रा, मानसिक संघर्ष, आस्था, आत्मअनुभव और जीवन-दृष्टि का आत्मकथात्मक वर्णन है। इसमें लेखक ने सिद्धि, ईश्वर, धर्म, मानसिक बीमारी और आत्मबोध से जुड़े अपने अनुभवों को साझा करते हुए निष्कर्ष निकाला है कि सच्ची साधना निष्कपट आचरण और ईश्वर पर विश्वास में निहित है।
- आस्था, अनुभव और आत्मबोध
- सिद्धि से सत्य तक की यात्रा
- जब भ्रम टूटा और विश्वास जागा
- ईश्वर, अनुभव और जीवन का सत्य
मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
मैं बहुत हद तक आर्य समाजी विचारधारा से प्रभावित रहा हूँ। हालांकि मैंने गीता, रामायण और अधिकांश पुराणों का अध्ययन किया है। फिर भी, आदि शक्ति गायत्री को छोड़कर मेरी आस्था किसी पूजा-पाठ, किसी भगवान और किसी धर्मग्रंथ तक में नहीं रही। मेरे पास अनगिनत यक्ष-प्रश्न थे, जिन्हें मैं पूछा करता था। बड़े-बड़े ज्ञानियों से भी कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता था। अंधभक्ति करने वालों से आध्यात्मिक चर्चा करके मुझे बहुत आनंद आता था। मेरे कोई भी प्रश्न साधारण नहीं थे। कोई शांति से जवाब देना शुरू भी करे तो अंत तक उसका क्रोध आपे से बाहर हो जाता था। मेरे माता-पिता, भाई-बहन तक मुझसे कन्नी काटते थे, रिश्तेदारों की तो बात ही मत कीजिए।
मेरे रिश्ते के एक फूफा हुआ करते थे। वे गायत्री के बड़े साधक थे, परंतु अक्सर मेरे पिता का उपहास उड़ाते रहते थे। इसलिए मैंने उन्हें कभी कोई भाव नहीं दिया। जब भी वे आते, लोग उनके पांवों में लोट-पोट हो जाते थे और मैं तुच्छ-सा प्राणी उनके सम्मान में टस से मस नहीं होता था। तब उन्हें जो सम्मान मिलता था, उसका आनंद उनके हृदय से गधे के सींग की तरह गायब हो जाता था। वे मुझे अजीब-सी नज़रों से देखते थे। इसके साथ ही एक घटना का ज़िक्र और करता हूँ। बचपन में मैं एक ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आ गया था, जो धार्मिकता का चोला ओढ़कर रहता था। उसका निवास हमारे पड़ोस में ही था। वह ऐसा धार्मिक व्यक्ति था, जो अक्सर छोटे बच्चों को बिगाड़ने और उनसे अश्लील बातें करने में आनंद लेता था। एक दिन ईश्वर ने उसे उसके कर्मों का बड़ा दंड दिया।
मैं मंदिरों या तीर्थस्थलों में अधिक विश्वास नहीं रखता था। हाँ, कभी-कभार मित्रों के साथ चला ज़रूर जाता था। गायत्री परिवार, ब्रह्माकुमारी संस्था और गीता प्रेस के साहित्य के अलावा ईसाई, मुस्लिम, सिख, जैन और बौद्ध धर्म का साहित्य भी पढ़ा, लेकिन लगाव आर्ष साहित्य से ही रहा। स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा लिखित ‘सत्यार्थ प्रकाश’ ने तो मानो मेरी सोच ही बदल दी। समय बीता और पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते धर्म-अध्यात्म से धीरे-धीरे दूर होता चला गया। इस बीच काफी आर्थिक हानि भी झेलनी पड़ी, क्योंकि मेरे ही खानदान के राधाकिशन पुत्र नारायण सिंह के कारण मुझे लाखों रुपये का नुकसान हुआ। मैं समझता हूँ कि यह व्यक्ति केवल अपने परिवार वालों को धनवान बनाने के लिए ही पैदा हुआ था। उसका काम लोगों से धन लेकर अपने परिवारीजनों के लिए ऐशो-आराम की सुविधाएँ जुटाना था। बाद में उसी के परिवार वालों ने उसे हाशिए पर फेंक दिया और अंततः उसने आत्महत्या कर अपनी जीवन-लीला समाप्त कर ली। उसके द्वारा लिया गया उधार भी उसके परिवार वालों ने नहीं चुकाया।
समय बीता…
वर्ष 2022 में मैं पुनः गीता प्रेस की ‘कल्याण’ पत्रिका का सदस्य बना। मेरी आस्था फिर से सनातन की ओर मुड़ने लगी। संयोगवश नेपाल के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों का भ्रमण करने और श्रीराम जन्मभूमि, अयोध्या जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मैं स्पष्ट कर दूँ कि ये धार्मिक यात्राएँ बिना मेरा एक भी पैसा खर्च हुए संपन्न हुईं। इसका श्रेय मेरे प्रेरणास्रोत डॉ. नरेश कुमार सिहाग एडवोकेट जी तथा डॉ. विकास शर्मा जी (हरियाणा) को जाता है। मेरे जीवन में सबसे बड़ी उथल-पुथल फरवरी 2024 में मची। सुबह का समय था। मेरे मस्तिष्क में एक अजीब-सी तरंग दौड़ी। मुझे लगा कि मैं बेहोश हो जाऊँगा, पर ऐसा हुआ नहीं। मैंने सामान्य होने की बहुत कोशिश की, पर सफल नहीं हो सका। धीरे-धीरे मैं भ्रम का शिकार हो गया। मुझे लगा कि मृत्यु मेरे सामने खड़ी है और अब सब समाप्त होने वाला है।
मैं ब्रेन अटैक का शिकार हो चुका था। मस्तिष्क में विचारों का ऐसा तूफान आया कि मुझे रात्रि के घोर अंधकार में भी सैकड़ों सूर्यों जैसा प्रकाश दिखाई देता था। नींद मुझसे कोसों दूर हो गई। नकारात्मक विचारों ने मन को घेर लिया। कुल मिलाकर मैं मानसिक रोग से ग्रस्त हो चुका था। इस दौरान मुझे कई भयावह अनुभव हुए। जैसे—भूत-प्रेतों की उपस्थिति का आभास होना, उन्हें महसूस करना, किसी के अधिक बोलने पर उसके प्रति अत्यधिक आक्रोश उत्पन्न होना और कभी-कभी इतना निराश हो जाना कि आत्महत्या जैसे विचार आने लगते थे। अकेले में लगता था कि अभी कोई ब्रह्मराक्षस सामने प्रकट हो जाएगा।
मैं अपने मन से लड़ते हुए उपचार कराता रहा। नियमित दवा ली और यह उपचार लगभग तीन वर्ष तक चला। अब सब सामान्य है। प्रसिद्ध गायक हनी सिंह भी कुछ ऐसी ही बीमारी का शिकार हुए थे। इस बीमारी से पीड़ित अनेक लोग स्वयं को अवतार घोषित कर देते हैं, क्योंकि उनके अनुभव इतने असामान्य होते हैं कि लोग उन्हें कुंडलिनी जागरण या सिद्धि प्राप्ति समझ बैठते हैं। मैं अकेले में ईश्वर से प्रार्थना करता था—”हे ईश्वर! यदि मैंने कभी किसी के साथ बेईमानी की है या किसी का अहित किया है, तो आपका हर निर्णय मुझे स्वीकार है। लेकिन यदि मैंने पूरी ईमानदारी से जीवन जिया है, आडंबरों से दूर रहकर केवल निराकार ईश्वर में विश्वास किया है, तो अब मुझे स्वस्थ करना आपका ही दायित्व है।”
इसके बाद मैं धीरे-धीरे सामान्य होता गया। ईश्वर का बार-बार धन्यवाद किया और आज भी उन्हें कोटि-कोटि प्रणाम करता हूँ। अब कुछ रहस्यमयी घटनाओं का उल्लेख करता हूँ, जो फरवरी 2024 से पहले मेरे साथ घटित हुईं। कई बार भविष्य में होने वाली घटनाओं का आभास पहले ही हो जाता था। यदि किसी व्यक्ति के संबंध में कोई विचार मन में आता, चाहे वह उसकी मृत्यु से जुड़ा ही क्यों न हो, तो चार-छह दिन के भीतर वह सत्य प्रतीत होता। उस समय यह मेरे लिए सामान्य बात थी। मुझे यह भी अनुमान हो जाता था कि मुझे कब और किस प्रकार की हानि होने वाली है, लेकिन उससे बच पाना संभव नहीं होता था। मैं हर संभव प्रयास करता, फिर भी जो होना होता, वह होकर ही रहता।
तब मैंने समझा कि जो होना है, वह होकर रहेगा। कोई सिद्धि, कोई ज्ञान उसे रोक नहीं सकता। आज जिन प्रश्नों के उत्तर मैं कभी दूसरों से खोजता था, उनमें से अनेक का उत्तर मुझे अपने अनुभवों से मिला है। परंतु मैं ईश्वरीय नियमों में कोई परिवर्तन नहीं कर सकता। ग्रहों की शांति या अदृश्य शक्तियों के भय का व्यापार करने वाले लोग आमजन को भ्रमित करते हैं। कोई भी सिद्धि हर समय कार्य नहीं करती। वह भी सीमित होती है, जैसे चार्ज होने पर बैटरी काम करती है और डिस्चार्ज होने पर सामान्य हो जाती है। ईश्वर हमारे जन्म से ही हमारे साथ होते हैं। जैसे-जैसे हमारी आस्था बढ़ती है, वैसे-वैसे उनका संरक्षण भी अनुभव होने लगता है।
लेकिन जैसे-जैसे हमारे भीतर कपट, चोरी, झूठ और मक्कारी बढ़ती है, हम उनसे दूर होते जाते हैं। मंदिर जाने या घंटों पूजा करने से अधिक महत्त्व निष्कपट सेवा और निर्मल मन का है। आज मेरे पास जीवन के हर प्रश्न का उत्तर होने का दावा नहीं है, लेकिन अपने अनुभवों ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है। मैं जैसा ईश्वर को समझता था, अनुभव भी लगभग वैसा ही रहा। हाँ, उस अनुभव तक पहुँचने के लिए मुझे बहुत कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ा। अब मुझे दुनिया पहले से बिल्कुल अलग दिखाई देती है। मेरी बातें शायद आप में से अनेक लोगों की समझ में न आएँ, क्योंकि हर व्यक्ति की जीवन-यात्रा और अनुभव अलग होते हैं।







