
डॉ. रीना रवि मालपानी (कवयित्री एवं लेखिका)
रमा की आँख के आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। उसने अपने पुत्र को भरी जवानी में ही खो दिया। स्मृति पटल पर राम की हर अटखेलिया एक के बाद एक याद आ रही थी। परवरिश करते-करते पता नहीं कहाँ चूक हो गई कि राम ने अकस्मात आत्महत्या का मार्ग चुन लिया। राम शुरू से लापरवाह और गैर-जिम्मेदार रवैय्या अपनाता था। पर राम की ताई का राम बहुत लाड़ला था। कभी भी परेशानी और समस्या आने पर वह ताई का आँचल ओढ़ लिया करता था। ताई को कोई संतान नहीं थी इसलिए वह सारा स्नेह और ममत्व राम पर लुटाया करती थी। उनके इस दुलार से राम में बुराई की लताएँ निरंतर फैलती जा रही थी। जब अध्ययन से भटकाव हुआ तब ताई ने दुकान डालने का रास्ता सुझाया।
दुकान चलाने के लिए भी ज़िम्मेदारी, मेहनत और अच्छे स्वभाव की जरूरत होती है। परंतु राम में तो ये गुण दूर-दूर तक विद्यमान नहीं थे। दुकान में घाटा चला गया फिर शुरू हुई कर्ज माँगने की गुहार। बैंक, आस-पड़ोस और रिश्तेदार, ताई ने सभी जगह से उसे भरपूर मदद दिलाई। पर ताई ने कभी भी उसे स्वयं की कमियों से अवगत नहीं कराया। अंततः कर्ज का दबाव उस पर इस कदर हावी हो गया की अंत में उसने आत्महत्या को ही समस्या का समाधान समझा। रमा को आज हर वो क्षण याद आ रहा था जब वह राम की गलतियों के लिए उसे डाँटती थी, पर ताई उसकी एक न चलने देती और उनके इस अंधे दुलार ने रमा को जीवन पर्यंत आंसुओं के सागर में डुबो दिया।
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रमा अंदर ही अंदर खुद को कोस रही थी कि काश मैंने इस चाशनी में डूबे रिश्ते को सही समय पर रोशनी दिखाई होती तो शायद नियति के इस निष्ठुर दिन का सामना न करना पड़ता। ताई के अतिशय प्रेम ने राम को स्वयं की अहमियत जानने और संघर्षों से जूझने का अवसर ही नहीं दिया। आज उसकी चुप्पी ने राम को जीवन भर के लिए चुप कर दिया। जीवन में तीखा, कड़वा, खट्टा-मीठा सभी का संगम होना जरूरी है। अति हर चीज की हानिकारक होती है।

प्रेषक: रवि मालपानी, सहायक लेखा अधिकारी, रक्षा मंत्रालय (वित्त) * 9039551172







