लघुकथा : ऑनलाइन

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अमृता राजेन्द्र प्रसाद
जगदलपुर

साहब के दोनों बच्चे अपने-अपने मोबाइल फोन पर ऑनलाइन क्लास में व्यस्त थे। जिसे देखकर सावित्री उदास हो गयी। उसका मन भी कहने लगा कि काश, मेरे बच्चों के पास भी ऐसा फोन होता तो कितना अच्छा होता। मेरे बच्चे भी पढ़ाई कर लेते. पर सावित्री काम करते-करते देख रही थी कि बघ्चों का मन पढ़ाई में बिल्कुल भी नही था।

वो बार बार घड़ी की तरफ देख रहे थे। कुछ देर बाद वो फोन दख देख कर हंसने लगे। दूसरे कमरे में मैडम अपने फोन से हंस-हंसकर बातें कर रही थी। पोछा करते सावित्री की नजर साहब के बेटे के फोन पर गयी, वह कोई वयस्क विडिओ देख रहा था। सावित्री अनपढ़ जरूर थी पर उसे सब समझ में आ रहा था। अब उसे उसके पास फोन न होने का कोई मलाल न रहा।

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