लघुकथा : प्रभु सब देखता है

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वीरेंद्र बहादुर सिंह

गांव की रहने वाली अवनी का विवाह शहर के एक संपन्न परिवार में हुआ था। अपने कार्य के प्रति निष्ठावान और संस्कारी पिता की एकमात्र संतान अवनी रूप, गुण और ज्ञान की त्रिवेणी थी। मायके में साधारण रहन-सहन और बचत का पाठ सीखने वाली अवनी की ससुराल में पैसों की रेलमपेल थी। शहर में उसके ससुर का कारोबार बहुत बढ़िया चल रहा था। उसका पति आकाश भी पिता के कारोबार में मदद करता था।

अवनी की कंजूसी को परिवार वाले मिडिल क्लास मेंटलिटी कह कर उसका मजाक उड़ाते थे। परिवार में सब से छोटी होने की वजह से अवनी किसी की बात का बुरा नहीं मानती थी। सब की अपनी-अपनी सोच है, यह मान कर वह अपने काम में लगी रहती। समय कब कहां किस के कहने में रहा है? वह एक जैसा भी नहीं रहता। धंधे में प्रतिद्व॔दिता बढ़ने की वजह से धीरे-धीरे कारोबार में घाटा होने लगा। घाटा बर्दाश्त न कर पाने की वजह से जेठ ने आत्महत्या कर ली।

इस परिस्थिति में अवनी ही सभी का सहारा बनी। पहले से ही मेहनत से काम करने वाली अवनी ने पापड़-अचार और नमकीन का गृह उद्योग शुरू किया। परिवार को भी अपने इस व्यवसाय में शामिल करने की कोशिश की। पर किसी का सहयोग नहीं मिला। सभी उसकी हंसी उड़ाते हुए कहते थे, “अरे ऐसा करने से क्या होने वाला है?”

पर अवनी धैर्य के साथ अपना काम करती रही। जैसे-जैसे काम बढ़ रहा था, उसका आत्मविश्वास बढता जा रहा था। धीरे-धीरे अवनी का ब्रांड बाजार में चल पड़ा। अवनी के पास कुछ रुपए आए तो उसने पति और ससुर को फिर से कारोबार शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया। ‘पैसा पैसे को अपनी ओर खींचता है।’ यह कहावत सच साबित हुई। लोग अवनी की खूब तारीफ करते थे, पर परिवार में जो कद्र अवनी की होनी चाहिए थी, वह नहीं थी।

फिर भी वह हमेशा खुश रहती थी। उसके मन में लोगों की कद्र की अपेक्षा ईश्वर की कद्र का अधिक महत्व था। वह प्रभु से हमेशा यही प्रार्थना करती थी कोई और भले न देखे, पर वह तो सब देखता ही है। ईश्वर सभी का भला करे। जो उसकी कद्र करे उसका भी, जो न करे उसका भी। जिसकी जैसी सोच।


¤  प्रकाशन परिचय  ¤

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वीरेंद्र बहादुर सिंह

लेखक एवं कवि

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जेड-436-ए, सेक्टर-12, नोएडा-201301 (उत्तर प्रदेश) | मो : 8368681336

Publisher »
देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड)

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