सावन ने पानी बरसाया

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कविता नन्दिनी

अबकी सावन ने आकर के
झमझम पानी बरसाया
प्यास बुझी धरती जीवन की
तन मन सबका हर्षाया

बस्ती के घर -घर में पाया
भीतर बाहर पानी था
जीवन था जंजाल बन गया
काल बन गया पानी था

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मन में जब इतनी दहशत हो
नहीं सुहाता सावन है
बादल की गरजन से दहला
बच्चों का भोला मन था

डर लगता है फिर वैसे ही
घनघोर घटा जब छाएगी
छिन जाएगा चैन सभी का
नींद कहा फिर आएगी।


¤  प्रकाशन परिचय  ¤

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From »

कविता नन्दिनी

कवयित्री

Address »
सिविल लाइन, आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश)

Publisher »
देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड)

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