
यह आलेख धार्मिक आस्था, मंदिरों में चढ़ावे की व्यवस्था और उससे जुड़े विवादों पर प्रश्न उठाता है। लेखक ने संत परंपरा के मूल संदेश, स्वैच्छिक योगदान और धार्मिक संस्थाओं में पारदर्शिता तथा आस्था की गरिमा बनाए रखने पर बल दिया है।
- आस्था, चढ़ावा और जिम्मेदारी
- राम के नाम की गरिमा
- मंदिर, चंदा और समाज
- भक्ति बनाम विवाद
ओ. पी. उनियाल
“राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट, अंतकाल पछताएगा जब प्राण जाएंगे छूट।” संत Kabir का यह दोहा सबने सुना ही होगा, पढ़े-लिखे लोगों ने पढ़ा भी होगा। वैसे भी दूसरों को सीख और ज्ञान देने वालों के मुखारबिंदु से प्रवचन के तौर पर तो कई बार सुनने का अवसर भी मिलता ही होगा। संत कबीरदास ने जिस भाव से यह दोहा रचा था, उसका अनुसरण तो न जाने किसने किया होगा, कौन करता होगा, कौन करेगा— यह तो कोई नहीं बता पाएगा, क्योंकि यह व्यक्तिगत भावना का मामला है।
आज “राम के नाम पर लूट है, लूट सके तो लूट, देरी करेगा तो पीछे जाएगा छूट”। तात्पर्य तो सभी समझ ही गए होंगे। एक कहावत भी है न— “समझदार को इशारा काफी।”
राम हिन्दुओं के आराध्य हैं। घर-घर पूजे जाते हैं। उनकी जीवन लीला का मंचन होता है। हमारे आदर्श, प्रेरणास्रोत, मार्गदर्शक एवं पवित्रता के द्योतक हैं, फिर उनके मंदिर में चढ़ावे को लेकर आरोप-प्रत्यारोपों की खिचड़ी क्यों पकी? राम के नाम का जो भी चढ़ावा है, वह उनको समर्पित है। उसका सही उपयोग होना चाहिए।
हालांकि, जगह-जगह हरेक देवी-देवताओं के छोटे-बड़े अनगिनत मंदिर हैं। अधिकतर की स्थिति लगभग एक जैसी ही है। पहले तो उनकी समिति बनती है, धीरे-धीरे चंदे व अन्य चढ़ावे को लेकर आपसी मतभेद उभरने लगते हैं। मंदिर कहीं भी हों, जबरन चंदा वसूली का ढर्रा नहीं होना चाहिए। जिसकी जितनी सामर्थ्य या स्वेच्छा हो, तदनुरूप योगदान होना चाहिए। अक्सर समिति बनती है, फिर चंदा वसूली होती है और नौबत चंदा विवाद की बन आती है।
ईश्वर एक है, नाम ही तो अलग-अलग हैं। नाम की गरिमा बनाए रखना ही भक्ति का एक मार्ग है।







