कविता : राह बदलना ही जरूरी था

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कविता : राह बदलना ही जरूरी था, उसके हर खेल में हारा, खेल को मिटा दिया मैंने…….! शातिर कम ना थी कहीं पे निगाहें, कहीं पर निशाना इस कहावत को समझ लिया मैंने… देहरादून से राजेश ध्यानी सागर की कलम से…

राह बदलना ही जरूरी था
बदल दी मैने……..!
दिल बदलना था जरूरी
बदल दिया मैने…….!

चेहरा था जो आंखों में
हटा दिया मैने………!
हर अदा जो कातिल थी
भगा दिया मैने……..!

उसके हर खेल में हारा
खेल को मिटा दिया
मैंने…….!
शातिर कम ना थी कहीं पे निगाहें
कहीं पर निशाना इस कहावत को
समझ लिया मैंने……..!

चेहरा था जो आंखों में हटा दिया मैंने……!


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