कविता : अपने-अपने धर्म

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सुनील कुमार माथुर

कोई दीन दुखियों की सेवा कर
इंसानियत का धर्म निभा रहा हैं

कोई आधी रात में बीमार पडोसी को
अपने वाहन में अस्पताल पहुंचा कर

पडोसी धर्म को निभा रहा है
मौहल्ले के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देकर

शिक्षक अपना धर्म निभा रहा हैं
संकट की घडी में उधार सामान देकर

व्यापारी अपना धर्म निभा रहा हैं
ईमानदारी व निष्ठा के साथ सुचारू रूप से

अध्ययन कर विधार्थी अपना धर्म निभा रहें है
दान पुण्य करके इंसान अपना मानव धर्म निभा रहा हैं

देवभूमि समाचार में इंटरनेट के माध्यम से पत्रकार और लेखकों की लेखनी को समाचार के रूप में जनता के सामने प्रकाशित एवं प्रसारित किया जा रहा है।

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