
यह कविता माँ के वात्सल्य, त्याग, ममता और क्षमाशीलता का भावपूर्ण चित्रण करती है। कवि माँ को घर की आत्मा बताते हुए उसके प्रेम, अनुशासन और आशीर्वाद को जीवन की सबसे बड़ी शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है।
- माँ: घर की धड़कन
- ममता की अनमोल छाँव
- माँ के आँचल की दुआ
- घर की जान है माँ
सिद्धार्थ गोरखपुरी
माँ का मतलब घर होता है,
घर का मतलब माँ होती है।
घर-रिश्ते हैं देह के जैसे,
माँ ही असल में जान होती है॥
पीर पराई भी माँ समझे,
समझे घर का हर कोना-कोना।
एक बार पुचकारे जब भी,
भागे तन-मन से जादू-टोना॥
माँ के आँचल में न जाने कितनी,
दुआ-दुआ-दुआ होती है।
माँ का मतलब घर होता है,
घर का मतलब माँ होती है॥
बेलन, सँडसी, चिमटा, मुक्का,
हथियार सदा सोभे मईया।
अंग-अंग ऊर्जित होता है,
जब-जब गलती पर धोवे मईया॥
कितना भी हम गलती कर लें,
हर हाल में माफ़ सज़ा होती है।
माँ का मतलब घर होता है,
घर का मतलब माँ होती है॥
माँ दिव्य तेज से ओत-प्रोत,
जिम्मेदारी में सदा है डॉक्टरेट।
माँ निर्भयता का वर देती है,
समझते नहीं कुछ इलिटरेट॥
यह ज्ञान ज़रूरी है सबको कि,
माँ अंतस में धड़कती जान होती है।
माँ का मतलब घर होता है,
घर का मतलब माँ होती है॥









