होली संग कान्हा

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प्रेम बजाज

ना जाने कैसा तुने मुझ पर रंग डाला ,
तन पर तो कोई रंग नहीं है ,
मन सतरंगी रंगों से रंग डाला।

मन मेरे में चुपके से आके बस गया एक नटखट ग्वाला ,
कोरी मोरी मन-चुनर को उसने पूरा भिगो डाला।

ये पागल मन मचलता है, भर नैनों में लाज शरमाती हूं,
अल्साए नैनन भी तो तेरे सपनों में खो जाते हैं,
कल्पना में मेरी कितने रंग बस गए , बताए नहीं बता पाती हूं ,
मन-मन्दिर में मोहिनी सूरत देख – देख मुस्काती हूं।

उसके मृदु स्वागत के लिए ऊर-द्वार खुला जाता है,
चुपके से वो ग्वाला आकर मेरे मन -मन्दिर में बस जाता है।

ढलका जाता आंचल मेरा , पांव थिरक – थिरक जाते हैं,
हर धड़कन मेरी गा रही गीत है, भाव चंचल हुए जाते हैं,
मानो किसी गंगा तट पर यौवन धुला-धुला जाता है ।
चुपके से वो ग्वाला मेरे ऊर-आंगन में आ जाता है।


¤  प्रकाशन परिचय  ¤

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From »

प्रेम बजाज

लेखिका एवं कवयित्री

Address »
जगाधरी, यमुनानगर (हरियाणा)

Publisher »
देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड)

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