
यह कविता भीषण गर्मी और बढ़ते तापमान से परेशान जनजीवन, पशु-पक्षियों और प्रकृति की व्यथा को अभिव्यक्त करती है। कवि ने सूरज को संबोधित करते हुए ताप कम करने और वर्षा लाने की भावपूर्ण प्रार्थना की है। कविता में प्रकृति के प्रति संवेदना और राहत की मानवीय आकांक्षा झलकती है।
- सूरज दादा से विनती
- तपती धरती की पुकार
- बरसात का इंतज़ार
- गर्मी से बेहाल संसार
सैनिक की कलम
गणपत लाल उदय अजमेर राजस्थान
हे सूरज दादा सूरज दादा कम करो अब अपना तेज,
दुश्वार हो रहा हमारा जीना उस चंदा मामा को भेज।
ये दिल की धड़कन तेज़ हो रही किसका करें परहेज,
उल्टी, दस्त और सरदर्द हो रहा अब हमको सहेज।।
गर्मी से हाल बेहाल हमारा पशु-पक्षी इंसान को देख,
पेड़ पौधे भी नष्ट हो रहें अब न आ रही इनमे महक।
काला पड़ गया बदन हमारा पसीने की बन रही रेख,
वर्षा को भेजो अब जल्दी टप टप करती बूंदे फेंक।।
ताप आपका जला रहा चक्षुओं पर डाल रहा प्रभाव,
लू भी थपेड़े मार रही अब किस किससे करें बचाव।
बनी हुई है गंभीर स्थिति दादा लाओ जल्दी बदलाव,
पड़ रहा भारी लम्हा-लम्हा आ रहा तन में खिंचाव।।
अतिरिक्त गर्मी कम करो थोड़ी शीतलता प्रदान करो,
तापमान नियंत्रित करो अब हाथ मस्तक हमारे धरो।
देर मत करो हे दिवाकर सोहार्द स्नेह और प्यार भरो,
टेंशन हमारी समाप्त करो और पीड़ाएं सबकी हरो।।
सुनने वाला कोई नही है इस भूमि पर हमारी ये बात,
माह जून-जुलाई की तपन में जल रहें हम दिन रात।
प्यासी धरा और प्यासे हम कर दो झमाझम बरसात,
जीवन और ऊर्जा के स्रोत देवता हो आप साक्षात।।









