
यह आलेख समाज में बढ़ती वीआईपी संस्कृति और दिखावे की प्रवृत्ति पर गंभीर सवाल उठाता है। इसमें बताया गया है कि कैसे लोग अपनी पहचान कर्मों के बजाय संपर्कों से जोड़ने लगे हैं। लेखक सादगी, आत्मसम्मान और मानवीय मूल्यों की ओर लौटने का संदेश देता है।
- जब पहचान बन गई संपर्कों की मोहताज
- दिखावे की दौड़ में खोता समाज
- वीआईपी सोच और गिरती संवेदनाएँ
- संपर्क नहीं, कर्म बनें पहचान
डॉ. सत्यवान सौरभ
मकान का मुहूर्त हो या दुकान का उद्घाटन, शादी-ब्याह की खुशियाँ हों या किसी अपने की मृत्यु का गम—हर जगह बड़े नेताओं और अफसरों की तस्वीरें चिपकाना अब “सम्मान” नहीं, बल्कि प्रभाव और पहुँच का प्रदर्शन बन चुका है। यह एक ऐसी मानसिकता को जन्म देता है, जहाँ इंसान की असली पहचान उसके कर्म से नहीं, बल्कि उसके “कनेक्शन” से तय होने लगती है। कभी घरों की दीवारों पर देवी-देवताओं की तस्वीरें होती थीं, जिनमें आस्था बसती थी, फिर उन दीवारों पर परिवार की तस्वीरें आईं, जिनमें अपनापन था, लेकिन आज वही दीवारें नेताओं और अफसरों के साथ खिंचवाई गई तस्वीरों से भर गई हैं, जिनमें न आस्था है, न अपनापन—सिर्फ एक संदेश है: “हम पहुँच वाले लोग हैं।”
यह “पहुँच” अब सुविधा नहीं, बल्कि सामाजिक हैसियत का प्रमाणपत्र बन चुकी है। यह दृश्य केवल दीवारों तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारे मानस में गहराई तक उतर चुका है। आज व्यक्ति खुद को अपने नाम से कम और अपने “संपर्कों” से ज्यादा पहचानता है। वह अपने परिचय में अपने गुणों, अपने काम या अपने व्यक्तित्व का उल्लेख कम करता है, लेकिन यह बताने में गर्व महसूस करता है कि वह किस नेता के करीब है या किस अधिकारी से उसकी पहचान है। यह प्रवृत्ति एक खतरनाक मोड़ पर पहुँच चुकी है, जहाँ आत्मसम्मान की जगह परोक्ष अहंकार ने ले ली है—ऐसा अहंकार जो खुद का नहीं, बल्कि दूसरों की ऊँचाई पर खड़े होकर पैदा होता है।
सबसे अधिक पीड़ादायक स्थिति तब बनती है जब यह दिखावा हमारे सबसे निजी और संवेदनशील क्षणों में भी प्रवेश कर जाता है। शोक, जो कभी सादगी, मौन और गहन संवेदना का समय हुआ करता था, आज बैनरों और पोस्टरों के नीचे दबने लगा है। किसी अपने की मृत्यु पर भी बड़े-बड़े होर्डिंग लगाकर नेताओं के साथ तस्वीरें चिपकाना मानो यह कहने का एक तरीका बन गया है कि “हमारा दुख भी वीआईपी है।” यह वाक्य जितना व्यंग्यात्मक है, उतना ही भयावह भी, क्योंकि यह हमारे भीतर मरती संवेदनाओं का प्रमाण है। यह स्थिति केवल एक आदत नहीं, बल्कि एक गहरी मानसिक असुरक्षा का परिणाम है। हम अपने भीतर कहीं न कहीं यह महसूस करने लगे हैं कि अगर हमने अपनी “पहुँच” नहीं दिखाई, तो समाज हमें गंभीरता से नहीं लेगा। हम यह मान बैठे हैं कि सम्मान पाने के लिए योग्य होना जरूरी नहीं, बल्कि “जुड़ा हुआ” होना जरूरी है।
सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और गहरा बना दिया है। अब हर खुशी एक पोस्ट है और हर दुख एक स्टेटस। लाइक्स और कमेंट्स की दुनिया में अब भावनाएँ भी “कंटेंट” बन चुकी हैं। लोग खुश होने से ज्यादा खुश दिखने में व्यस्त हैं, और दुखी होने से ज्यादा दुख दिखाने में। यह दिखावा धीरे-धीरे हमारी सच्ची भावनाओं को निगल रहा है। यह दिखावा समाज में एक अदृश्य प्रतिस्पर्धा को भी जन्म दे रहा है। एक व्यक्ति अगर किसी बड़े नेता के साथ फोटो लगाता है, तो दूसरा उससे भी बड़ा नाम ढूँढने की कोशिश करता है। यह एक ऐसी दौड़ बन जाती है, जिसका कोई अंत नहीं है। इस दौड़ में इंसानियत, सादगी और आत्मसम्मान धीरे-धीरे पीछे छूट जाते हैं।
लोकतंत्र के दृष्टिकोण से भी यह प्रवृत्ति बेहद चिंताजनक है। जब समाज में व्यक्ति की पहचान उसके संपर्कों से तय होने लगती है, तो समानता और न्याय जैसे मूल सिद्धांत कमजोर पड़ने लगते हैं। इसका सबसे गहरा प्रभाव हमारी नई पीढ़ी पर पड़ रहा है। बच्चे और युवा यह देखकर बड़े हो रहे हैं कि समाज में सम्मान पाने के लिए काबिलियत से ज्यादा जरूरी है “कनेक्शन” होना। हमें यह समझना होगा कि हर चीज को दिखाने की जरूरत नहीं होती। कुछ भावनाएँ निजी होती हैं, और उनकी गरिमा सादगी में ही बनी रहती है। समाज में बदलाव की शुरुआत हमेशा व्यक्ति से होती है। अगर हम सच में इस दिखावे की संस्कृति से बाहर निकलना चाहते हैं, तो हमें खुद से शुरुआत करनी होगी।
असली सम्मान और प्रतिष्ठा हमारे व्यवहार, हमारे कर्म और हमारे मूल्यों से बनती है—न कि किसी फोटो या पोस्ट से। क्योंकि अंत में कोई यह याद नहीं रखता कि आपने कितने बड़े लोगों के साथ फोटो खिंचवाई थी। लोग यह याद रखते हैं कि आप कैसे इंसान थे, आपने दूसरों के साथ कैसा व्यवहार किया, और आपने समाज को क्या दिया।







