पलायन रोकने के लिए ठोस कार्ययोजना जरूरी

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ओम प्रकाश उनियाल

उत्तराखंड से लगातार लोगों का पलायन होना वास्तव में गंभीर विषय बनता जा रहा है। पलायन भी दो प्रकार का कहा जा सकता है। एक तो रोजगार के लिए किसी अन्य शहर में जाना एवं साथ ही साथ अपने घर-गांव बराबर आकर देखभाल करते रहना। या सेवानिवृति के बाद गांव में ही बसावट करना। दूसरा जिस शहर में जो रोजगार कर रहे हैं वहीं स्थायी रूप से बस जाना।

स्थिति यह है कि उत्तराखंड से जो लोग दूसरे शहरों या मैदानी इलाकों में रोजगार कर रहे हैं वे वहीं बसना पसंद कर रहे हैं। वे न तो अपने गांव जाना चाहते हैं, ना ही वहां के माहौल से परिचित होना चाहते हैं। यदा-कदा जाना भी हो तो केवल सैर-सपाटे के तौर पर। यहां तक कि पहाड़ों में जो सरकारी नौकरी-पेशा लोग हैं उनमें से भी अधिकतर उत्तराखंड के मैदानी इलाकों में बस चुके हैं, बस भी रहे हैं और बसने की चाहत भी रखते हैं।

पहाड़ में लोग खेती करना छोड़ते जा रहे है जंगली जानवरों का बहाना बनाकर। कारण समझने का कोई प्रयास ही नहीं कर रहा है और ना ही करना चाहता है। बस एक-दूसरे की देखादेखी के कारण खींचतान चल रही है। यदि यही हाल राज्य के सीमांत क्षेत्रों में बन जाए तो राज्य और देश की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। उत्तराखंड की सीमा चीन से लगती है।

चीन तो हमेशा ही घुसपैठ की फिराक में रहता है। सीमांत इलाकों में रहने वाले शत्रु की हर हरकत से ज्यादा परिचित होते हैं। उन्हें घुसपैठियों की पहचान होती है, दर्रों व रास्तों का पता होता है। सीमा की सुरक्षा में तैनात सेना व अर्द्धसैनिक बलों के जवानों तक दुश्मन की हल्की-सी सुगबाहट की आहट पहुंचाने में उनका काफी सहयोग मिल सकता है।

इन सब स्थितियों को देखते हुए सीमांत क्षेत्रों में राज्य और केंद्र सरकार को वहां के लोगों के लिए वहीं अधिक से अधिक रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा सहित अन्य मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए। राज्य सरकार सीमांत इलाकों से पलायन रोकने हेतु कार्ययोजना बनाने पर विचार तो कर रही है। जो कि सरकार की एक बड़ी उपलब्धि होगी।


¤  प्रकाशन परिचय  ¤

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ओम प्रकाश उनियाल

लेखक एवं स्वतंत्र पत्रकार

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कारगी ग्रांट, देहरादून (उत्तराखण्ड) | Mob : +91-9760204664

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देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड)

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