April 1, 2026

सिद्धार्थ गोरखपुरी

यह कविता आधुनिक शहरों की भागदौड़ में खोती जा रही ग्रामीण संस्कृति, अपनापन और मानवीय रिश्तों की...
सिद्धार्थ गोरखपुरी नित नए बाजार जाइए औकात पता चलती है कमाना और… और… और है अनूठी बात...
[box type=”info” align=”alignleft” class=”” width=”100%”] कविता : धृतराष्ट हुईं हैं सरकारें… असल बुद्धिजीवी वर्ग (मीडिया जगत ) बर्बरीक़...
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