कविता माटी से जुड़े रहने, मेहनत, आत्मविश्वास और संघर्ष के बीच आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देती है। इसमें धरती को माँ की गोद बताते हुए विनम्रता, कर्म, धैर्य और कठिन परिस्थितियों से निखरने के भाव को प्रमुखता दी गई है। रचना का संदेश है कि अपनी जड़ों से जुड़े रहकर कर्म और मेहनत के बल पर व्यक्ति अपनी पहचान और सम्मान अर्जित कर सकता है।
- माटी से जुड़ी पहचान
- मेहनत से खिलता जीवन
- कर्म ही हमारी पहचान
- धरती से जुड़े रहो
डॉ. सत्यवान सौरभ
माटी से रिश्ता रहे, मन में हो विश्वास।
आँधी चाहे जो करे, ना छोड़े हम आस।।
धूप मिली तो तप गए, छाँव मिली तो ठौर।
मेहनत से पहचान है, माँगें ना कुछ और।।
पग-पग काँटे मिल गए, फिर भी रुके न पाँव।
साथी बनकर संग चली, हिम्मत की जब छाँव।।
गिरकर फिर उठते रहे, यही हमारी रीत।
मुश्किल चाहे लाख हो, हार न माने जीत।।
महल झूठ के चमकते, सादा अपना द्वार।
माटी की खुशबू सदा, बसता सच्चा प्यार।।
ऊँची बातें क्या करें, कर्म रहे पहचान।
जितना ऊँचा वृक्ष हो, उतनी गहरी जान।।
राह कठिन हो सामने, कदम रहें गतिमान।
मेहनत जिसके साथ हो, उसके ऊँचे मान।।
जो धरा से जुड़ा रहे, उसको ना अभिमान।
फल से लदकर वृक्ष भी, झुककर देता दान।।
बूँद पसीने की लिए, सपनों की पहचान।
मेहनत से खिलता सदा, जीवन का गुलदान।।
माटी माँ की गोद है, इसका रख सम्मान।
इसी धरा के नाम से, रोशन हो पहचान।।
कठिन समय की चोट से, निखर रहा इंसान।
पत्थर सहकर ही बने, मंदिर की पहचान।।
हमने अपनी राह को, दिया स्वयं आकार।
किस्मत के बल पर नहीं, कर्म हमारा सार।।
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक हैं।)
कवि, सामाजिक विचारक एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,
333, परी वाटिका, कौशल्या भवन, बड़वा (सिवानी), भिवानी, हरियाणा – 127045

