
यह आलेख संपादक के नाम पत्र लेखन की परंपरा, उसकी सामाजिक उपयोगिता और जनसमस्याओं के समाधान में उसकी भूमिका को रेखांकित करता है। लेखक ने पत्र-पत्रिकाओं में घटते जनमंचों पर चिंता जताते हुए जनसरोकारों के लिए पत्र लेखन को पुनः सक्रिय करने की अपील की है। (हमारे विशेष संवाददाता द्वारा)
- संपादक के नाम पत्रों की घटती परंपरा
- जनसमस्याओं की आवाज और पत्र लेखन
- पत्रों से समाधान तक की यात्रा
- जब पत्र बने जनहित का माध्यम
जोधपुर। सम्पादक के नाम पत्र लेखन भी एक कला है, जो हर किसी के बस की बात नहीं है। चूंकि पत्र भी ऐसा होना चाहिए, जिस पर तत्काल प्रभाव से कार्यवाही हो। जोधपुर के स्वतंत्र लेखक व पत्रकार सुनील कुमार माथुर के पत्र नियमित रूप से पत्र-पत्रिकाओं में हर रोज प्रकाशित हुआ करते थे और उन पर तत्काल प्रभाव से कार्यवाही भी हुआ करती थी। उनकी सम्पादक के नाम पत्र में गहन रुचि को देखते हुए जोधपुर से प्रकाशित दैनिक जनगण समाचार पत्र के प्रकाशक व सम्पादक माणक चौपड़ा ने उन्हें जनगण विचार मंच का अध्यक्ष बनाया था और हर वार्ड में जनगण विचार मंच के संयोजक नियुक्त किए। उनके द्वारा प्रेषित समाचार व समस्याओं को प्राथमिकता के साथ प्रकाशित किया जाता था और उन पर कार्यवाही भी हुआ करती थी।
माथुर ने बताया कि तकनीकी दौर में आज पत्र-पत्रिकाओं ने “जनता की अदालत”, “लोक मंच”, “जनवाणी”, “आपके पत्र”, “सम्पादक की डेस्क से”, “निगाहें आपकी”, “पत्र आपके मंच हमारा”, “डाक मिली” जैसे स्तम्भ बंद कर दिए, जिसके परिणामस्वरूप आज जनता-जनार्दन की समस्याओं को उजागर करने का कोई स्थायी मंच नहीं रहा है। जो पत्र-पत्रिकाएं कॉलम चला रही हैं, वे मात्र इक्का-दुक्का पत्र प्रकाशित कर इतिश्री कर रहे हैं, जिसके कारण आज देश भर में समस्याओं का अंबार लगा हुआ है। पत्र लेखक सुनील कुमार माथुर ने बताया कि हमारे जनप्रतिनिधि तो वैसे ही उदासीन हैं। उन्हें जन समस्याओं के समाधान में कोई रुचि नहीं है तथा संबंधित विभाग के अधिकारी व कर्मचारी भी आंखें मूंदे बैठे हैं।
ऊपर से पत्र-पत्रिकाओं ने भी सम्पादक के नाम पत्र प्रकाशित करना बंद कर दिया, जिससे जनता-जनार्दन परेशान है और उनकी कहीं भी सुनवाई नहीं हो रही है। माथुर ने बिजली-पानी की समस्याओं को ही नहीं, बल्कि टूटी-फूटी सड़कों की मरम्मत, स्वतंत्रता सेनानियों पर डाक टिकट जारी करने, चुनावी हिंसा, पत्रकारों का शोषण, छोटे नोटों का संकट, बढ़ती सड़क दुर्घटनाएं, फुटपाथों पर दुकानें, पशु-पक्षियों के चुनाव चिन्ह पर रोक, राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलाने, साधुओं पर हमला, उजड़ते चौराहे, पत्रकारों का दायित्व, डाकघर में घोटाला, शराबबंदी, प्रेस की आजादी, शिक्षा का गिरता स्तर, सदन की गरिमा, आरक्षण की राजनीति जैसे सैकड़ों विषयों पर अपनी ठनठनी लेखनी चलाई और उनका समाधान भी हुआ।
पत्र लेखक सुनील कुमार माथुर के पत्र दैनिक जनगण, जलते दीप, प्रतिनिधि, रोज मेल, तीसरा प्रहर, तरुण राजस्थान, राष्ट्रदूत, नवज्योति, राजस्थान पत्रिका, नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान के अलावा चौथी दुनिया, प्रलय दीप, रेल दूत, सीमा दूत, कायस्थों की दुनिया, कंट्रोलर, हिन्दू संदेश, नारी एक्सप्रेस, मारवाड़ रा पूत, सूर्यमुखी, राजकुल संदेश, सरस्वती प्रेम पाक्षिक, राजस्थान केसरी, लहरों की बरखा जैसे सैकड़ों समाचार पत्रों में प्रकाशित हो चुके हैं। माथुर ने समाचार पत्रों के सम्पादकों से अपील की है कि वे अपने-अपने पत्र-पत्रिकाओं में करीब आधा पृष्ठ सम्पादक के नाम पत्रों हेतु सुरक्षित करें, ताकि अधिकाधिक समस्याओं का समय रहते समाधान हो सके। उन्होंने कहा कि समस्या समाधान चाहती है, न कि दलगत राजनीति।








