
आलेख में सकारात्मक सोच, परोपकार, सतर्कता और मानवीय मूल्यों की महत्ता को सरल शब्दों में समझाया गया है। लेखक ने बताया है कि जीवन की असली खुशबू सेवा, विनम्रता और दूसरों के दुःख को समझने में छिपी होती है।
- सकारात्मक सोच से मिलती है सफलता
- परोपकार से महकता है जीवन
- सतर्कता और विश्वास का महत्व
- आलोचना से घबराएं नहीं, आगे बढ़ें
सुनील कुमार माथुर
जोधपुर, राजस्थान
हर व्यक्ति के सोचने, समझने और काम-काज करने का अलग-अलग तरीका होता है और वे अपने हिसाब से कार्य करते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जितने व्यक्ति, उतनी सोच और तरीके हैं। एक सीढ़ी है, जिस पर लोग दिनभर आते-जाते रहते हैं। जब ऊपर से कोई व्यक्ति नीचे जाता है तो वह मन में विचार करता है कि सीढ़ी व्यक्ति को ऊपर ले जाने के बजाय नीचे ले जाती है। उसका ऐसा सोचना मात्र मन में नकारात्मक सोच पैदा करता है। लेकिन कोई दूसरा व्यक्ति नीचे से ऊपर उसी सीढ़ी के माध्यम से जाते हुए यह सोचता है कि यह सीढ़ी हमें नीचे से ऊपर ले जाती है, तब उस व्यक्ति की सोच सकारात्मक सोच होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि हमें सदैव सकारात्मक सोच ही रखनी चाहिए। सकारात्मक सोच हमें अपनी मंजिल तक आसानी से बिना बाधा के पहुंचा देती है।
जिसकी सोच सकारात्मक होती है, वह अपने लक्ष्य को सफलतापूर्वक हासिल कर लेता है, चूंकि सकारात्मक सोच से हमारे मन-मस्तिष्क में नई ऊर्जा का संचार होता है और हमारे में आत्मविश्वास जागृत होता है। जहां आत्मविश्वास है, वहीं सफलता चरण चूमती है। इसलिए सदैव अच्छा सोचें, अच्छा करें और ऐसा ही दूसरों को करने के लिए प्रेरित करें। यही आदर्श जीवन व्यतीत करने का अनोखा व अनूठा तरीका है। हर कार्य सोच-समझकर ही करें, ताकि बाद में पछताना न पड़े। आज की इस भाग-दौड़ भरी जिंदगी में हर किसी पर आंखें मूंदकर विश्वास न करें। चूंकि अंधभक्ति नुकसान पहुंचा सकती है। आज हर कोई आपके भोलेपन का लाभ उठाना चाहता है और आपको पता भी नहीं चल पाता है, और जब तक पता चलता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
आज अधिकांश लोग ऐसे हैं, जिनके मुंह में राम और बगल में छुरी वाली कहावत चरितार्थ होती है। वे मीठी-मीठी बातें तभी करते हैं, जब उनका हमसे कोई स्वार्थ जुड़ा हो। वे दोगली बातें करते हैं, जो आप आसानी से समझ नहीं पाते हैं और वे आपके भोलेपन का लाभ उठा लेते हैं। अतः जब भी कोई व्यवहार करें तो सोच-समझकर ही करें। कहते हैं कि सावधानी में ही आपकी भलाई है, अन्यथा चिकनी-चुपड़ी बातें आपके जी का जंजाल बन सकती हैं। अतः सावधान रहें, सतर्क रहें। आज लोग यह बात धड़ल्ले से कहते हैं कि सांप पर विश्वास कर लीजिए, लेकिन इंसान पर विश्वास सोच-समझकर ही कीजिए। चूंकि वह सांप से भी अधिक खतरनाक हो गया है। कब अपने मुख से कही बात से भी पलट जाए।
जैसे दूध से भरे भगोले में खटाई की एक बूंद भी पड़ जाए तो वह सारे दूध को फाड़ देती है। ठीक उसी प्रकार ये स्वार्थी लोग सदैव ही दो मित्रों व दो परिवारों में फूट डालने का ही काम करते हैं। संसार में ऐसे लोग किसी का भी भला नहीं कर सकते हैं। वे दो लोगों के बीच लड़ाई कराकर दूर खड़े रहकर मजा देखते हैं। वहीं दूसरी ओर दोनों पक्षों के हितैषी भी रहना चाहते हैं। इस धरती पर जो पाप बढ़ रहा है, वह ऐसे लोगों की वजह से ही बढ़ रहा है। ऐसे लोगों का भला करने का अर्थ “आ बैल मुझे मार” वाली कहावत को ही चरितार्थ करना कहा जा सकता है। दोस्ती हो तो दूध और पानी जैसी हो। अगर दूध में पानी डाल दिया जाए तो वह पानी का भाव भी दूध के बराबर कर देता है। अगर दूध उफन रहा है तो उसमें चंद बूंदें पानी की डाल दी जाएं तो पानी स्वयं जल जाएगा, लेकिन उफनते दूध को उफनने से बचा लेगा।
जीवन में प्यार, दया, करुणा, ममता, वात्सल्य, अहिंसा, त्याग और सहनशीलता की हवा रोज बहनी चाहिए अर्थात ऐसा व्यवहार सभी के साथ हो। ऐसी जीवनदायिनी हवा ही हमारे व्यक्तित्व में निखार लाती है। यह तभी संभव है जब हमारी सोच सकारात्मक हो और दूसरे की पीड़ा को हम अपनी पीड़ा समझकर उसके दुःख को कम एवं दूर करने का प्रयास करें। केवल अच्छा भोजन करने, हर रोज नए वस्त्र पहनने, आलीशान बंगले में रहने और अत्याधुनिक सुविधाओं का लाभ उठाने से कोई व्यक्ति महान नहीं बनता है। महान बनने के लिए परोपकार का भाव हो तथा त्याग और सहनशीलता का होना नितांत आवश्यक है।
जीवन में खुशबू लानी है तो…
ज्ञान का नियमित रूप से आदान-प्रदान होता रहना चाहिए। आदान-प्रदान से ही ज्ञान बढ़ता है। अन्यथा उस ज्ञान का क्या महत्व है, जो किसी के जीवन को न संवार सके। केवल शरीर पर क्रीम-पाउडर लगाने से ही जीवन में खुशबू नहीं आती है। हां, इससे शरीर में कुछ घंटों के लिए भले ही खुशबू बनी रहे, लेकिन जीवन में असली खुशबू लाने के लिए हमें परोपकार के कार्य करने होंगे। वहीं अपनी अकड़ का त्याग कर जीवन में झुकने की प्रवृत्ति को अंगीकार करना होगा। अरे, एक वृक्ष की डाल झुककर हमें ताजे-ताजे फल व पुष्प दे सकती है, तो क्या हम इंसान जीवन में सेवा व परोपकार का कर्म करते हुए जरूरतमंद की सेवा का कर्म तो कर ही सकते हैं। अगर हम किसी रोते हुए इंसान को हंसाने का प्रयास करें तो यह भी एक पुण्य का कार्य है। चूंकि वर्तमान दौर में तो वैसे ही अधिकांश लोगों के चेहरों पर उदासी के बादल मंडरा रहे हैं। उनके चेहरे पर से हंसी व मुस्कान नदारद है।
अगर हम थोड़ा-सा प्रयास करें तो दुःखी लोगों के चेहरों पर एक मधुर मुस्कान ला सकते हैं। बस हमारा प्रयास निस्वार्थ भाव से ओत-प्रोत होना चाहिए। जब परिवार के सभी सदस्यों के चेहरे पर मधुर मुस्कान होगी, तभी तो समूचे समाज व राष्ट्र की जनता-जनार्दन के चेहरों पर मुस्कान आ पाएगी। भंवरा उसी खिले हुए पुष्प पर मंडराता है, जिसमें सुगंध होती है। ठीक उसी प्रकार हमें सुगंधित पुष्प बनकर (सेवाभावी बनकर) समाज को आदर्श स्वरूप प्रदान करना है। याद रखिए, जीवन में उसी व्यक्ति की आलोचना होती है, जो कर्मशील होता है। सच्चा, सजग, जागरूक, निष्ठावान और समाज में खरी-खरी बात मुख पर कहने वाला हो। अन्यथा निठल्लों की कौन आलोचना करता है।
अतः आलोचना से कभी भी न घबराएं। अपितु यह सोचकर अपना रचनात्मक कार्य जारी रखें कि ये आलोचक ही हमारे सही मायने में शुभचिंतक हैं। ये हमारे कार्य से भले ही ईर्ष्या करते हों, लेकिन मन ही मन में वे यह भी जानते हैं कि ये लोग रचनात्मक कार्य न करें तो आज परिवार, समाज व राष्ट्र पिछड़ जाए।
सुनील कुमार माथुर
सदस्य अणुव्रत लेखक मंच एवं
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार
33 वर्धमान नगर, शोभावतों की ढाणी, खेमे का कुआं, पाल रोड, जोधपुर, राजस्थान





