
यह कविता आर्थिक संकट, बढ़ती महंगाई और राष्ट्रीय चुनौतियों के बीच स्वदेशी अपनाने, फिजूलखर्ची रोकने और एक-दूसरे का सहयोग करने का संदेश देती है। कवि ने देशभक्ति, संयम और सकारात्मक सोच के माध्यम से सामूहिक जिम्मेदारी निभाने का आह्वान किया है।
- स्वदेशी अपनाओ, देश बचाओ
- संकट काल में संयम का संदेश
- महंगाई और राष्ट्रभक्ति की पुकार
- एकजुटता से टलेंगे संकट
सैनिक की कलम
गणपत लाल उदय, अजमेर, राजस्थान
ना खरीदना एक साल, मेरे भाइयों, चांदी और सोना,
आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है देश की, प्यारी बहना।
सबको लड़ना है इन विपत्तियों से, ना कोई घबराना,
संकट में बनकर ढाल सभी, एक-दूजे के साथ रहना।।
घटती रहती हैं कई घटनाएं इस मानवीय जीवन में,
समर्थानुसार मदद करें, यह बात बताएं जन-जन में।
कम करें आना-जाना हर व्यक्ति देश एवं विदेशों में,
पेट्रोल-डीजल, गैस बचाएं, विचार करो अंतर्मन में।।
बढ़ती जनसंख्या का वर्तमान में सभी ध्यान रखना,
मार रही महंगाई निर्धन को, इस पर विचार करना।
हल्का कीजिए स्वयं को यारों, क्योंकि ऊंचा उठना,
रणभूमि का अर्जुन बनकर काज अनोखा करना।।
ना खरीदो विदेशी सामान, न फिजूल वाहन चलाना,
वतन-पताका लहराओ और स्वदेशी को अपनाना।
सच्चे देशभक्त बनकर अपनी एक पहचान बनाना,
भ्रम नहीं पालो बर्बादी का, पुरजोर ताकत लगाना।।
उस ईश्वर ने संभाल रखे हैं हर व्यक्ति के बही-खाते,
रात-रात भर जागकर आज लिख रहे हम ये बातें।
संकट समस्त टल जाएंगे और मिलेंगी शुभ सौगातें,
सकारात्मक परिणाम आएगा, बात हम यह बताते।।









