March 13, 2026

1 thought on “लेखक की स्वतंत्रता बनाम संपादकीय नीति: बहस के नए आयाम

  1. आलेख में उठाए गए मुद्दे उचित है । रचनाकार अपनी मौलिक रचनाएं एक से अधिक जगह भेज सकता हैं चूंकि पत्र पत्रिकाएं दैनिक , साप्ताहिक , पाक्षिक , मासिक , त्रैमासिक , अर्द्ध वार्षिक व वार्षिक तक होती हैं । पहले लेखकों को पारिश्रमिक व लेखकीय प्रति मिलती थी व स्वार्धिकार प्रकाशक के पास सुरक्षित रहते थे । उनकी अनुमति बिना कोई उनका प्रयोग नहीं कर सकता था लेकिन आज न तो लेखकीय प्रति मिलती है और न ही पारिश्रमिक । इसलिए धड़ल्ले से एक ही रचना अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रहीं हैं । प्रकाशको / संपादक मंडल को राय देने का अर्थ होगा लेखक का ब्लेक लिस्ट होना । यह एक कटु सत्य है ।

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