गोरन टिब्बा : एक रोमांचक यात्रा का नया प्रारंभिक बिंदु

इस उत्कृष्ट पर्वत के सम्मुख, इस ट्रैक पर पहली बार ट्रैकिंग करने वाले ललित प्रसाद तिवारी का योगदान इस योजना एक नया प्रारंभिक बिंदु है, जो पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ स्थानीय विकास को भी प्रोत्साहित करेगा। इसलिए, गोरन टिब्बा को ‘ललित प्रसाद तिवारी ट्रैक’ के नाम से जाना जाना चाहिए, #अंकित तिवारी (ऋषिकेश)
देहरादून जिले के नाहीकला क्षेत्र में स्थित गोरन टिब्बा, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और प्राचीन इतिहास के लिए प्रसिद्ध है, अब एक नए पहलुओं की ओर बढ़ रहा है। वन विभाग की एक उद्यमी योजना के तहत, यहां का पर्यटन बढ़ाने के लिए गोरन टिब्बा पर्यटकों के लिए एक आकर्षक ट्रैकिंग रूट के रूप में विकसित करने की योजना बना रहा है। वन विभाग इसका प्रस्ताव तैयार कर रहा है।इस पहाड़ी के समीप स्थित प्राचीन गुफा और मंदिर के साथ, यह स्थल प्राकृतिक सौंदर्य और स्थानीय ऐतिहासिक महत्व का प्रतीक है।
लेकिन, इस पहाड़ी का नाम ‘गोरन टिब्बा’ न केवल इसकी ऊंचाई और वन्यजीवों से घिरे होने के कारण है, बल्कि इसके पीछे एक रोमांचक कथा भी छिपी है। प्राचीन काल में, इस पहाड़ी पर गोरन नामक एक वीर रहता था, जो कि इस गुफा से आवाजाही करता था, जिससे लोग अपने आपको सुरक्षित महसूस करते थे। इसके अलावा, यहां के पर्यावरण प्रेमी और शिक्षक जगदीश ने बताया कि ग्रामीणों के सहयोग से ललित प्रसाद तिवारी ने यहां एक माता का मंदिर बनाया था, जो बाद में वज्रपात से टूट गया।

वन विभाग नाहीकला से गोरन टिब्बा तक करीब छह किलोमीटर पैदल मार्ग को ट्रैकिंग रूट के रूप में विकसित करने जा रहा है। वहीं नाही से सतेली मार्ग के सौंदर्गीकरण करने की भी योजना है। वन विभाग ने इसके लिए निरीक्षण कर लिया है। ट्रैकिंग रूट विकसित होने से यह क्षेत्र पर्यटन के रूप में विकसित होगा। जिससे वन विभाग की राजस्व की भी मिलेगा।
इस उत्कृष्ट पर्वत के सम्मुख, इस ट्रैक पर पहली बार ट्रैकिंग करने वाले ललित प्रसाद तिवारी का योगदान इस योजना एक नया प्रारंभिक बिंदु है, जो पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ स्थानीय विकास को भी प्रोत्साहित करेगा।
इसलिए, गोरन टिब्बा को ‘ललित प्रसाद तिवारी ट्रैक’ के नाम से जाना जाना चाहिए, जो उनकी प्रेरणादायक कहानी को साझा करता है और उनके योगदान को मानता है। इस योजना से न केवल पर्यटन क्षेत्र का विकास होगा, बल्कि उसका ऐतिहासिक महत्व भी साकार होगा, जो लोगों को इसके साथ जोड़े रहेगा।
यह लेख के लेखक अंकित तिवारी, शोधार्थी, अधिवक्ता एवं पूर्व विश्वविद्यालय प्रतिनिधि हैं