उत्तराखंड की बिगड़ती तस्वीर, गड़बड़ाया सामाजिक आर्थिक ताना-बाना

उत्तराखंड की बिगड़ती तस्वीर, गड़बड़ाया सामाजिक, आर्थिक ताना-बाना… इन शहरों में पहाड़ से भी लोग पलायन कर आ रहे हैं। स्थिति यह है कि देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल और ऊधमसिंह नगर सरीखे मैदानी जिलों के आसपास के ग्रामीण क्षेत्र नए शहरों और कस्बों में बदल रहे हैं।
देहरादून। आबादी के असंतुलन ने उत्तराखंड राज्य के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ताने-बाने को बुरी तरह से प्रभावित किया है। राज्य के रहने लायक 84.6 प्रतिशत भूभाग में 48 प्रतिशत आबादी रह रही है जबकि 14.4 प्रतिशत भूभाग में 52 प्रतिशत लोग बसे हैं। रोजगार, अच्छे इलाज और बेहतर जीवन शैली के लिए पहाड़ से बड़ी आबादी का पलायन लगातार जारी है। जिससे जनसांख्यिकीय असंतुलन की स्थिति पैदा हो गई है।
जानकारों का मानना है कि राज्य की जनसंख्या वृद्धि बेशक विस्फोटक नहीं है लेकिन असंतुलन एक बड़ी चिंता और चुनौती का कारण है। यह असंतुलन जितना अधिक बढ़ेगा, राज्य के सामाजिक, आर्थिक राजनीतिक ताने-बाने को उतना अधिक छिन्न-भिन्न करेगा। इसलिए नीति नियामकों को जनसांख्यिकीय असंतुलन को संभालने के लिए गंभीर प्रयास और नीति नियोजन करने होंगे।
उत्तराखंड ग्राम्य विकास एवं पलायन निवारण आयोग की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के 3946 गांवों से 117981 लोग पलायन कर गए। वर्ष 2022 तक 6430 गांवों से 307310 लोगों ने अस्थायी पलायन किया। बड़ी आबादी के पलायन से पर्वतीय क्षेत्र में खेती-बाड़ी उजाड़ हो रही है और अन्य आर्थिक व पारंपरिक काम धंधे ठप पड़ चुके हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में लोग गांवों को छोड़कर वहां के छोटे कस्बों और शहरों में आ बसे हैं।
भू-धंसाव के कारण सुर्खियों में रहा जोशीमठ इसका ताजा उदाहरण है। जोशीमठ में उसके आसपास के गांवों के लोग लगातार बसते गए और इस शहर पर उसकी धारण क्षमता से अधिक आबादी का दबाव बढ़ चुका है। यही हाल देहरादून, हल्द्वानी, हरिद्वार, रुड़की, रुद्रपुर, ऋषिकेश, कोटद्वार, श्रीनगर, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, टनकपुर, खटीमा, सितारगंज के आसपास के ग्रामीण इलाकों का है। यूपी, हिमाचल, हरियाणा और दिल्ली राज्य की सीमाओं से सटे शहरों में पड़ोसी राज्य की आबादी का दबाव पहले से ही बना है।
इन शहरों में पहाड़ से भी लोग पलायन कर आ रहे हैं। स्थिति यह है कि देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल और ऊधमसिंह नगर सरीखे मैदानी जिलों के आसपास के ग्रामीण क्षेत्र नए शहरों और कस्बों में बदल रहे हैं। यहां कृषि क्षेत्र लगातार घट रहा है। कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 2011-12 से 2022-23 तक राज्य में 156291 हेक्टेयर कृषि रकबा घट गया। 2011-12 में 909305 हेक्टेयर कृषि भूमि थी, जो 2022-23 में 753014 हेक्टेयर रह गई।
शहरों में आबादी का लगातार दबाव बढ़ने से ट्रैफिक जाम, जल भराव, कूड़े की गंभीर होती समस्या और पेयजल संकट की चुनौती लगातार गंभीर हो गई है। सरकार के स्तर पर अगले 20 से 30 वर्षों को ध्यान में रखकर बेशक योजनाओं का स्वरूप तैयार हो रहा है, लेकिन इनके निर्माण की गति से अधिक नई आबादी का दबाव बढ़ने से दिक्कतें और गंभीर हो रही हैं। पर्यटन और तीर्थाटन राज्य होने की वजह उत्तराखंड पर फ्लोटिंग आबादी का सात गुना दबाव है।
यही वजह है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पीएम से लेकर नीति आयोग और केंद्र सरकार के मंचों पर राज्य में फ्लोटिंग आबादी के हिसाब से केंद्रीय सहायता की मांग करते हैं। राज्य में चारधाम यात्रा, कांवड़ यात्रा, हेमकुंड यात्रा समेत कई धार्मिक यात्राओं में करोड़ों श्रद्धालु उत्तराखंड आते हैं। इन श्रद्धालुओं के लिए सरकार को बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था करानी होती है। इस बार यमुनोत्री और गंगोत्री धाम में श्रद्धालुओं के उमड़े सैलाब के आगे राज्य की व्यवस्थाएं चरमरा गई थीं।