खिड़की का कोना

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राज शेखर भट्ट

घर में चार दीवारें थीं, छत पर चार मिनारें थीं।
हंसी-खुशी मिलते थे सब, रिश्तों में वहीं दरारें थीं।
बातों-बातों में दो-चार थी होती, पर शीतल सी फुहारें थीं।
दिल में थे अंगारे भरे, पर चारों ओर बहारें थीं।

उम्र गयी और वृद्ध हुआ मैं, अब भी वो बिछौना याद है।
जहां पे मेरा समय था बीता, वो खिड़की का कोना याद है।

रिश्ते-नाते देखे सारे, पर जीवन तो जिया नहीं।
दुख मुझको है कोई नहीं, खुशियों का रस भी पिया नहीं।
दुख सबके थे बांटे मैंने, पर अपने गमों को सिया नहीं।
सबको बांटी केवल खुशियां, कुछ गलत तो मैंने किया नहीं।

परिवार की खुशियों की खातिर मेरा, रातों का रोना याद है।
जहां पे मेरा समय था बीता, वो खिड़की का कोना याद है।

एक रोज जो घर की छत से देखा, गली में इतना अंधेरा था।
चहल-पहल रहती थी जहां, वहां सुनसानी का घेरा था।
खुशियों का फिर महल बनाया और ख्वाबों में उसका डेरा था।
समय भी बीता और यादों में मेरी अब भी उसका चेहरा था।

खिड़की से जिसको देखा था, वो रंग सलौना याद है।
जहां पे मेरा समय था बीता, वो खिड़की का कोना याद है।

©Written Date : 29.03.2017

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