कविता : पैंतीस साल का समाजवाद

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आशुतोष

पैंतीस बरस बिहार के जोतलीं
अब सोचत ही जोतब दिल्ली हो
बिहार पलायन के युग में गेल
पूरा भारत के पलायन कराइब हो।।

जाति के जाति में बंटलन
उद्योग धंधा बंद करौलन
बिहार के टुकड़ा में बंटलन
बड़का समाजवादी कहौलन।।

बड़का बडका वादा करैत हत
बीस लाख रोजगार दैत हत
रोजगार के रोडमैप त देख
उद्योग धंधा भाड में, रंगबाज बाजार में।।

बेगूसराय में डबल कांड
एक करे दूजे परेशान
नित होत है ठाय॔ ठायं
प्रशासन बोले साय॔ साय॔

भईल राजा हमार प्रदेश के
अपनॆ मन मिट्ठू बनत है
केहू न पूछे सब जानत है औकात
घोटाले पर घोटाला का है उस्ताद
यही है बिहार का पैंतीस साल का समाजबाद।।

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¤  प्रकाशन परिचय  ¤

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From »

आशुतोष, लेखक

पटना, बिहार

Publisher »
देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड)

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