
यह आलेख प्रकृति प्रेम, जीवन दर्शन, सकारात्मक सोच, भक्ति और आत्मसुधार के माध्यम से संतुलित जीवन जीने का संदेश देता है। लेखक ने प्रकृति संरक्षण, सुख-दुःख की समझ, मन की उलझनों से बाहर निकलने और प्रेम व विनम्रता को जीवन के मूल मूल्य बताया है।
- प्रकृति से जीवन तक का सफर
- सकारात्मक सोच और जीवन का संतुलन
- भक्ति, प्रेम और जीवन दर्शन
- प्रकृति के संग सुखमय जीवन
सुनील कुमार माथुर
जोधपुर, राजस्थान
मुकेश बचपन से ही प्रकृति प्रेमी हैं। उसका जितना शिवजी की भक्ति में प्रेम और विश्वास है, उतना ही प्रकृति के प्रति भी प्रेम और लगाव है। वह शिक्षक होने के नाते खाली समय में पेड़-पौधों पर विशेष ध्यान देता था और बच्चों को भी पौधे लगाने के लिए प्रेरित करता था। सेवानिवृत्ति के बाद उसने अपना पूरा समय बागवानी को समर्पित कर दिया। सवेरे जल्दी उठकर नंगे पांव हरी-हरी दूब पर घूमना, पौधों को पानी देना, सूखी व बिखरी हुई पत्तियों को एकत्रित कर उनका समय पर निस्तारण करना, खाद डालना उसकी दिनचर्या बन गई। मुकेश के बड़े भाई दिनेश ने यह बगीचा लगाया था और उसमें चीकू, आम, सीताफल, गोंदे तथा तरह-तरह के गुलाब के फूल लगाए।
उनकी अनुपस्थिति में मुकेश आज बगीचे की देखभाल कर रहा है और उसकी मेहनत भी रंग लाई। मोहल्ले के लोग बगीचे में आकर न केवल सवेरे-सवेरे ठंडी-ठंडी हवा का आनंद ही लेते हैं, अपितु जाते समय कोई पूजा के लिए गुलाब का फूल, कोई गोंदे तो कोई आम अपने साथ ले जाता और मुकेश को प्रकृति प्रेमी कहकर उसका हौसला-अफजाई करते रहते हैं। मुकेश का प्रकृति के प्रति प्रेम देखकर अन्य लोगों ने भी अपने-अपने घरों के आसपास पेड़-पौधे लगाकर अपने शहर को प्रकृति के अनुरूप हरा-भरा कर दिया और मुकेश की मेहनत रंग लाई।
सुख-दुःख
सुख और दुःख का गरीबी और अमीरी से कोई लेना-देना नहीं है। अक्सर लोग महलों में रोते हुए और झोपड़ियों में हंसते हुए देखे और सुने जाते हैं। सुख और दुःख जीवन में आते ही रहते हैं। अगर दुःख न हो तो सुख का और सुख न हो तो दुःख का अहसास कैसे होगा। याद रखिए, सुख व दुःख कभी भी एक साथ नहीं आते हैं। इनका आना-जाना तो जीवन में लगा ही रहता है। इसलिए व्यक्ति को हर परिस्थिति में एक समान रूप से बना रहना चाहिए। जो परिस्थितियों को देखकर चलता है, उसके जीवन में कभी भी दुःख नहीं आता, क्योंकि जो परिस्थितियों को देखकर चलता है, उसके साथ हर वक्त परमात्मा खड़े रहते हैं। तभी तो कहा जाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी इंसान बहुत कुछ सीख लेता है एवं बिना बाधा के अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेता है।
मन की उलझनें
मन की उलझनों में न उलझो। एक धागा सुलझाओ तो दूसरा उलझ ही जाता है। ठीक इसी तरह हमारी जिंदगी है। अनेक जिम्मेदारियों को निभाते-निभाते इंसान से कहीं न कहीं भूल हो ही जाती है, लेकिन उसे कभी भी गहराई से नहीं लेना चाहिए। मन में नाना प्रकार के विचार आते रहते हैं, लेकिन हमें उचित समय पर उचित निर्णय लेना चाहिए। कभी भी इस चक्कर में न पड़ें कि समाज के लोग क्या कहेंगे। आप कितना भी अच्छा कर लो, लेकिन गलती निकालने वाले कहीं न कहीं गलती निकालने में लगे ही रहते हैं। अतः हमें बिना सिर-पैर की बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। जहां गलत होने की आशंका हो, वहां समय रहते गलती सुधारने में कोई झिझक नहीं होनी चाहिए।
किसी का हम अच्छा न कर सके तो कोई बात नहीं है, लेकिन किसी का बुरा भी नहीं करना चाहिए, क्योंकि दुनिया कमजोर है लेकिन दुनिया बनाने वाला नहीं। ईश्वर सर्वशक्तिमान है। हर कोई उसके आगे नतमस्तक है। हम सब उसकी संतान हैं। जब उसने हमें इतना सुंदर बनाया है, आनंद व अपार खुशियां दी हैं, तो हम क्यों दूसरों का बुरा करें। आखिर वे भी तो हमारे ही भाई-बंधु हैं, फिर भला बताइए कि हम अपनों का ही बुरा क्यों सोचेंगे। सदैव सकारात्मक सोच रखो और जीवन की राह में आगे बढ़ते रहिए। सफलता आपके कदम अवश्य ही चूमेगी।
भक्ति की राह
भक्ति की राह जरा कठिन अवश्य है, लेकिन जो इस राह पर पूरी ईमानदारी व निष्ठा से चलता है, उसे ईश्वर की अवश्य प्राप्ति होती है। आज भले ही हम अपने आपको प्रगतिशील, आधुनिक, शिक्षित और तकनीकी युग का इंसान मानते हैं और अपनी सफलता पर गौरवान्वित महसूस करते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि लोग छोटी-छोटी असफलताओं से ही घबरा जाते हैं और आत्महत्या जैसा जघन्य कदम उठा लेते हैं, जो किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। अपितु इसे एक तरह की कायरता कहा जा सकता है। जब आपको जीवन कठिन लगे तो भक्ति की राह चुनो। वहां शांति भी है और समाधान भी है।
दोषों को छुपाने का नहीं, मिटाने का उपाय करो
ऐसा कोई भी इंसान नहीं है जिसने कभी कोई गलती न की हो। जो कार्य करेगा, उससे गलती अवश्य होगी। लेकिन समय रहते गलती को अवश्य सुधार लेना चाहिए। हम इंसान हैं और इंसान से गलती होना कोई बड़ी बात नहीं है। यह अलग बात है कि कोई काम ही नहीं करेगा तो उससे गलती क्या होगी। इसलिए दोषों को छुपाने का नहीं बल्कि मिटाने का प्रयास करें और गुणों को दिखाने का नहीं, उन्हें जगजाहिर करने या प्रचारित-प्रसारित करने से बचना चाहिए।
लम्बी यात्रा
जीवन की लंबी यात्रा है। अतः हमें अपना जीवन भक्ति भाव, आराधना, कथा-कीर्तन, भजन संध्या आदि में लगाना चाहिए। सारी जिंदगी हाय धन, हाय धन नहीं करना चाहिए। हमें अपने रोजगार के अलावा ईश्वर भक्ति में भी समय लगाना चाहिए। लेकिन हम ऐसा नहीं कर रहे हैं। अक्सर लोग मुसीबत के वक्त ही ईश्वर का स्मरण करते हैं, जो ठीक नहीं है। नियमित रूप से ईश्वर का स्मरण करते रहने से ईश्वर भी हमारी समस्याओं का समय रहते निदान करते रहते हैं और हमें पता भी नहीं चलता कि कब समस्या उत्पन्न हुई और उसका समाधान कैसे हो गया। जीवन तो एक लंबी यात्रा है और सुख-दुःख, कामयाबी, अनुभव — ये जीवन के छोटे-छोटे स्टेशन हैं, लेकिन जो हमारे साथ यात्रा करता है, वह प्रेम है।
सबसे बड़ा उपहार और सम्मान
उपहार और सम्मान प्राप्त कर इंसान को इतराना नहीं चाहिए, क्योंकि आज के इस तकनीकी युग में उपहार और सम्मान धड़ल्ले से बिक रहे हैं। ऑनलाइन पैसे का भुगतान कीजिए और जैसा चाहे वैसा सम्मान व उपहार प्राप्त कीजिए, फिर व्हाट्सएप पर अपनी फोटो के साथ प्रमाणपत्र, मेडल, कप पोस्ट कर अपने मित्रों व रिश्तेदारों से बधाइयां बटोरते रहिए। कहते भी हैं कि दो पल की जिंदगी के दो नियम हैं — निखरों फूलों की तरह और बिखरों खुशबू की तरह। किसी को प्रेम देना सबसे बड़ा उपहार है और किसी का प्रेम पाना सबसे बड़ा सम्मान है।







