
लेख में हिन्दी भाषा के प्रति सम्मान और उसके दैनिक जीवन में प्रयोग की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। लेखक ने सोशल मीडिया और हिन्दी दिवस तक सीमित रहने के बजाय परिवार, समाज और राष्ट्र के स्तर पर हिन्दी को अपनाने का आह्वान किया है।
- हिन्दी केवल दिवस तक सीमित न रहे
- हिन्दी हम सबकी पहचान
- हिन्दी को सम्मान दिलाने की जरूरत
- नित-नित हो हिन्दी का गुणगान
भुवन बिष्ट, रानीखेत (उत्तराखंड)
रानीखेत। आज हम सभी को एकता, अंतर्मन की चेतना जागृत करके हिन्दी को मान-सम्मान दिलाने के लिए प्रयासरत रहने की नितान्त आवश्यकता है। आज हर जनमानस अंग्रेजी का बोझ उठाए हुए है और अपनी मातृभाषा हिन्दी को केवल दिल में दबाए बैठा हुआ है। वास्तव में देखा जाए तो आज हिन्दी को केवल दिवस तक सीमित करने में सभी की भूमिका तो रही है ही, किन्तु आम जनमानस ने भी मातृभाषा हिन्दी को बेगाना सा कर दिया है। क्योंकि अंग्रेजी को हर जनमानस अब प्रतिष्ठा से भी जोड़ने लगा है। सोचा जाए तो बहुभाषाओं का ज्ञान होना कोई बुराई नहीं है, किन्तु मातृभाषा हिन्दी को नकारात्मक दृष्टि से देखना अवश्य ही घातक एवं चिंतनीय विषय है। भाषाओं में आंचलिक भाषाओं का भी अपना महत्व है। आंचलिक भाषाएं आंचलिक संस्कृति, परंपराओं से जोड़े रखती हैं। इसके साथ-साथ हिन्दी भाषा पूरे राष्ट्र को एक माला में पिरोकर रखने का कार्य करती है।
मातृभाषा हिन्दी पूरे भारतवर्ष की संस्कृति, सभ्यता, परंपराओं को एक सूत्र में बांधे रखती है। यह पूरे राष्ट्र की एकता, अखंडता को दिखलाती है। हिन्दी भाषा को हम सभी भले ही अनेकों नाम देने में सक्षम हों, चाहे वह राष्ट्रभाषा, मातृभाषा, राजभाषा, किन्तु हम सभी ने इसे अपनी आत्मारूपी मन में सर्वप्रथम उतारने का प्रयास शायद ही किया हो। क्योंकि आज सोशल मीडिया चाहे वह फेसबुक हो या व्हाट्सऐप या ट्विटर आदि अनेकों माध्यम, जिनसे एक दिवस में तो लगता है कि मानो अब बाढ़ सी आ गई है, चाहे वह किसी दिवस पर ही क्यों न हो। कट-पेस्ट, इधर का उधर, फॉरवर्ड आदि माध्यमों से उस समय ऐसा लगता है कि मानो अब सब कुछ पल भर में सुधर गया है और सबकी अंतर्मन की चेतना मानो जागृत हो गई हो। लेकिन दिवस बीतते ही लगता है कि बाढ़ अपने साथ सब कुछ बहा कर ले गई है और रह जाती है केवल खामोशी। कब तक ऐसा ही सब कुछ चलता रहेगा? हिन्दी को मान-सम्मान दिलाने के लिए कब सबके मन की अंतःआत्मा जागृत होगी, यह भी विचारणीय है।
आज भले ही हम सभी हिन्दी दिवस के अवसर पर या हिन्दी पखवाड़े के अवसर पर हिन्दी का खूब गुणगान करते हैं, क्या वास्तव में हम सभी इसे अपने जीवन में अपनाते हैं? क्या कभी हमने अपने परिवार व बच्चों से हिन्दी को अपनाने के लिए प्रेरित किया है? आज यह विचारणीय एवं चिंतनीय प्रश्न है। जब बात स्वयं या स्वयं के परिवार द्वारा हिन्दी को अपनाने की होती है तो सभी अपने कदम पीछे खींचने लग जाते हैं। क्योंकि कहीं हिन्दी से उनका मान-सम्मान व सामाजिक रुतबा, प्रतिष्ठा कम न हो जाए। हिन्दी का स्वयं के घर में, स्वदेश में ये हाल बहुत चिंतनीय व विचारणीय है। सोशल मीडिया पर चाहे वह फेसबुक हो अथवा व्हाट्सऐप, इन सभी पर मानो एक दिवस के लिए एक क्रांति सी आ जाती है, लेकिन विडम्बना यह है कि यह क्रांति मात्र हमारे मोबाइलों तक सिमटकर रह जाती है। इसे हम सभी अपने हृदय में उतारने की कोशिश भी नहीं करते हैं।
हिन्दी कब राष्ट्रभाषा का स्थान ले पाएगी, यह विचारणीय एवं मनन योग्य है। आज हिन्दी अपने ही देश में बेगानी सी बनती जा रही है। कारण है आज दिखावे की प्रतिस्पर्धात्मक भावना का जन्म होना। आज अंग्रेजी भाषा ने सभी के दिलों-दिमाग पर कब्जा बना लिया है। सभी अपने-अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से इंग्लिश मीडियम विद्यालयों में ही पढ़ाना पसंद कर रहे हैं और हिन्दी भाषा को केवल हीन भावना की दृष्टि से देखा जाने लगा है। यह सबसे अधिक चिंताजनक एवं मनन योग्य प्रश्न है। हिन्दी केवल बोली-भाषा नहीं, अपितु यह हम सबकी शान है। हमारे देश में हिन्दी दिवस, हिन्दी सप्ताह धूमधाम से मनाया जाता है। आज हिन्दी विश्व की भाषाओं में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने के लिए तैयार है। आजकल भले ही अंग्रेजी भाषा का कुछ स्थानों पर महत्व बढ़ा हो, किन्तु इससे हिन्दी भाषा के प्रभाव को कम नहीं किया जा सकता है।
हिन्दी आज भी सबकी पहचान बनी हुई है। हिंदी भारत में सबसे ज्यादा बोले जाने वाली भाषा है और इसे राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। राजभाषा के रूप प्राप्त सम्मान से हिन्दी आज भी अपने को गौरवान्वित महसूस करती है। हिन्दी भाषा में साहित्य का अपार भंडार है और हमारे देश हिन्दी भाषा प्रेमियों का भी अपार भंडार है। किन्तु आज अंग्रेजी भाषा को एक फैशन के रूप में बहुत अधिक बढ़ावा दिया जाने लगा है, जिससे कभी-कभी हिन्दी को लोग हीन भावना की दृष्टि से देखने लगते हैं, जो अत्यधिक पीड़ादायक है। आज अपने ही भारतवर्ष में हिन्दी भले संघर्षरत हो, किन्तु विदेशों में भी हिन्दी ने अपना लोहा सदा मनवाया है। हिन्दी सम्मानजनक भाषा है, जिसे राजभाषा, मातृभाषा का स्थान भी प्राप्त है। 14 सितंबर को भारत की संविधान सभा ने अपनी आधिकारिक भाषा के रूप में हिंदी को अपनाया। प्रत्येक वर्ष हिंदी दिवस के रूप में, हिन्दी सप्ताह के रूप में मनाया जाता है।
भारतवर्ष के कई स्कूल, कॉलेज और कार्यालयों में इस दिन को बहुत उत्साह के साथ मनाते हैं। आज आवश्यकता है हम सभी को हिन्दी को अधिक से बढ़ावा देना चाहिए। हिन्दी सदैव ही गौरवशाली रही है और हम इसकी तुलना अंग्रेजी से करके इसके मान-सम्मान को कम नहीं कर सकते। हम सभी को सच्चे मन से हिन्दी को राष्ट्रभाषा का सम्मान दिलाने के सदैव प्रयासरत रहना चाहिए। हम सभी को न केवल मोबाइल, सोशल मीडिया या मात्र एक दिवस तक इस भाषा को सीमित नहीं रखना चाहिए, अपितु सदैव इसे अपनाकर हिन्दी को सम्मान प्रदान करना चाहिए। हम सभी को स्वयं एवं अपने परिवार से भी हिन्दी भाषा को बढ़ावा देने के लिए प्रयास करना चाहिए। जिससे गौरवशाली हिन्दी का सदैव सम्मान बना रहे। सदैव मिलजुलकर, एकता रूपी पुंज से हिन्दी भाषा को भी मान-सम्मान दिलाने के लिए प्रयासरत रहना चाहिए। हिन्दी भाषा का नित-नित हो गुणगान, केवल दिवस तक सीमित न रह जाए हिन्दी की पहचान।
एकता-अखंडता की प्रतीक भी है हिन्दी
हिन्दी भाषा पूरे राष्ट्र को एक माला में पिरोकर रखने का कार्य करती है। मातृभाषा हिन्दी पूरे भारतवर्ष की संस्कृति, सभ्यता, परंपराओं को एक सूत्र में बांधे रखती है। यह पूरे राष्ट्र की एकता, अखंडता को दिखलाती है। हिन्दी भाषा को हम सभी भले ही अनेकों नाम देने में सक्षम हों, चाहे वह राष्ट्रभाषा, मातृभाषा, राजभाषा, किन्तु हम सभी ने इसे अपनी आत्मारूपी मन में सर्वप्रथम उतारने का प्रयास सदैव करना चाहिए, तभी हिन्दी को उचित मान-सम्मान मिल पाएगा।
केवल दिवस-पखवाड़ा तक मात्र सीमित न हो हिन्दी का गुणगान
आज सोशल मीडिया चाहे वह फेसबुक हो या व्हाट्सऐप या ट्विटर आदि अनेकों माध्यम, जिनसे एक दिवस या एक पखवाड़े में तो लगता है कि मानो अब बाढ़ सी आ गई है, चाहे वह किसी दिवस पर ही क्यों न हो। कट-पेस्ट, इधर का उधर, फॉरवर्ड आदि माध्यमों से उस समय ऐसा लगता है कि मानो अब सब कुछ पल भर में सुधर गया है और सबकी अंतर्मन की चेतना मानो जागृत हो गई हो। लेकिन दिवस बीतते ही लगता है कि बाढ़ अपने साथ सब कुछ बहा कर ले गई है और रह जाती है केवल खामोशी। कब तक ऐसा ही सब कुछ चलता रहेगा। हिन्दी को मान-सम्मान दिलाने के लिए कब सबके मन की अंतःआत्मा जागृत होगी, यह भी विचारणीय है।






