
यह कविता आंखों की मौन भाषा और उनमें छिपे प्रेम, विश्वास, पीड़ा, शर्म, मान और जीवन के अनुभवों को अभिव्यक्त करती है। कवि ने नयनों को मन के भावों का सच्चा दर्पण बताते हुए उनके भीतर छिपे संसार को शब्द दिए हैं।
- नयनों की भाषा
- आँखों में छिपा संसार
- आँखें मन का आईना
- नयनों में प्रेम और विश्वास
डॉ. सत्यवान सौरभ
आँखों में सपने बसे, मन में पलते भाव।
आँख समझ लेती सदा, बिन बोले मनभाव॥
आँख मिली तो खिल उठे, मन के सूने द्वार।
नयनों की इक दृष्टि में, छिपा हुआ संसार॥
आँखों से आँसू बहे, मन की पीड़ा बोल।
शब्द जहाँ चुप हो गए, नयन गए सब खोल॥
नयन झुकें तो प्रेम है, नयन उठें तो मान।
आँखों की भाषा पढ़े, केवल सच्चा प्राण॥
आँख दिखाती सत्य को, चाहे मुख कुछ और।
नयनों से छलता नहीं, मन का कोई छोर॥
आँखों में जो शर्म है, उसमें प्रेम अपार।
नयनों की उन चुप्पियों में, छिपा हुआ संसार॥
आँखों का विश्वास ही, रिश्तों की पहचान।
टूटे जब विश्वास तो, सूना लगे जहान॥
नयन मिले तो बात हो, नयन हटे तो मौन।
आँखों जैसी बोलती, भाषा होती कौन॥
आँखों में इतिहास है, आँखों में कल भोर।
जिसने नयनों को पढ़ा, समझा जीवन-कोर॥
आँखें केवल देखतीं, ऐसा मत अनुमान।
नयन सँजोते प्रेम भी, देते मन को ज्ञान॥
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक हैं।)







