
कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित चैटबॉट मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में शुरुआती संवाद और सहायता का माध्यम बन रहे हैं। लेख में एआई की सुलभता और संभावनाओं के साथ गलत सलाह, भावनात्मक निर्भरता, गोपनीयता और मानवीय संवेदना जैसी चुनौतियों पर चर्चा करते हुए एआई को चिकित्सक का विकल्प नहीं, बल्कि सहयोगी माध्यम मानने पर जोर दिया गया है।
- मानसिक स्वास्थ्य में एआई की बढ़ती भूमिका
- एआई बने सहारा, चिकित्सक नहीं विकल्प
- मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में एआई की संभावनाएं और चुनौतियां
- एआई के साथ चिकित्सक, यही है सही दिशा
डॉ. प्रियंका सौरभ
मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों के बीच अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई आधारित चैटबॉट लोगों के लिए तेजी से संपर्क का पहला माध्यम बनते जा रहे हैं। अकेलापन, चिंता, तनाव, अवसाद, रिश्तों की उलझन या भावनात्मक संकट के क्षणों में कई लोग पहले किसी चिकित्सक के पास जाने के बजाय एआई से बातचीत करना पसंद कर रहे हैं। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में, जहां मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच अभी भी असमान है, एआई तकनीक एक नई संभावना प्रस्तुत करती है। हालांकि, यह समझना आवश्यक है कि एआई मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार करने का माध्यम हो सकता है, उनका विकल्प नहीं।
भारत में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की सबसे बड़ी चुनौतियों में प्रशिक्षित विशेषज्ञों की सीमित उपलब्धता, ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में सेवाओं का अभाव, उपचार की लागत तथा मानसिक बीमारी से जुड़ा सामाजिक कलंक शामिल हैं। ऐसे वातावरण में एआई की चौबीसों घंटे उपलब्धता महत्वपूर्ण अवसर पैदा करती है। व्यक्ति जब चाहे अपनी समस्या साझा कर सकता है और प्रारंभिक स्तर पर जानकारी, भावनात्मक सहारा तथा स्व-सहायता संबंधी सुझाव प्राप्त कर सकता है। एआई आधारित डिजिटल मानसिक स्वास्थ्य प्लेटफॉर्म इस दिशा में उपयोगी भूमिका निभा सकते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं के प्रति सामाजिक झिझक भी एआई के उपयोग को बढ़ावा दे सकती है। अनेक लोग परिवार, मित्र या चिकित्सक के सामने अपनी भावनाएं व्यक्त करने में संकोच करते हैं। अपेक्षाकृत गुमनाम डिजिटल बातचीत उन्हें अपनी चिंता, डर और परेशानियों को शब्द देने का अवसर देती है। इस प्रकार चैटबॉट मानसिक स्वास्थ्य संबंधी संवाद की पहली सीढ़ी बन सकते हैं और व्यक्ति को आवश्यकता होने पर आगे पेशेवर सहायता लेने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।
एआई का एक महत्वपूर्ण लाभ शुरुआती स्क्रीनिंग में भी है। व्यक्ति के संवाद, व्यवहार और कुछ डिजिटल संकेतों का विश्लेषण करके एआई संभावित चिंता, अवसाद या अन्य मानसिक स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों की पहचान में सहायता कर सकता है। हालांकि, ऐसी स्क्रीनिंग को अंतिम चिकित्सकीय निदान नहीं माना जाना चाहिए। इसका उद्देश्य केवल संभावित जोखिम को पहचानकर व्यक्ति को उचित विशेषज्ञ तक पहुंचाने में सहायता करना होना चाहिए।
भारत की भाषाई विविधता को देखते हुए बहुभाषी एआई तकनीक भी विशेष महत्व रखती है। यदि मानसिक स्वास्थ्य संबंधी जानकारी और प्रारंभिक सहायता केवल अंग्रेजी या कुछ सीमित भाषाओं तक रहेगी, तो बड़ी आबादी इससे बाहर रह जाएगी। भाषा-तकनीक और भारतीय भाषाओं के लिए विकसित डिजिटल प्रणालियां इस अंतर को कम कर सकती हैं। भविष्य में ऐसी सेवाओं को टेली-मानस जैसी सरकारी मानसिक स्वास्थ्य पहलों के साथ जोड़कर दूरदराज के क्षेत्रों तक प्रारंभिक सहायता पहुंचाई जा सकती है।
व्यक्तिगत सहायता भी एआई की एक उपयोगी विशेषता हो सकती है। दवा लेने की याद दिलाना, नींद और दिनचर्या पर ध्यान देने के लिए प्रेरित करना, तनाव कम करने के अभ्यास सुझाना या संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा आधारित संरचित स्व-सहायता गतिविधियों में मार्गदर्शन देना कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जहां एआई सहयोगी भूमिका निभा सकता है। चिकित्सकों के लिए भी एआई मरीजों की नियमित निगरानी, जोखिम वाले मामलों की पहचान और प्राथमिकता तय करने में सहायक हो सकता है। इससे सीमित मानव संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग संभव हो सकता है।
लेकिन अवसरों के साथ जोखिम भी गंभीर हैं। भावनात्मक संकट में व्यक्ति अत्यधिक संवेदनशील स्थिति में होता है। यदि एआई गलत, अधूरी या संदर्भहीन जानकारी देता है तो वह व्यक्ति की समस्या को और बढ़ा सकता है। किसी नकारात्मक या भ्रमपूर्ण धारणा को चुनौती देने के बजाय चैटबॉट अनजाने में उसे मजबूत कर दे, तो परिणाम गंभीर हो सकते हैं। यही कारण है कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े एआई सिस्टम में सामान्य सूचना देने वाले चैटबॉट और चिकित्सकीय सहायता देने वाले प्रमाणित उपकरणों के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए।
सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होता है, जब व्यक्ति एआई को वास्तविक चिकित्सक का विकल्प समझने लगता है। लगातार बातचीत के कारण भावनात्मक निर्भरता भी विकसित हो सकती है। व्यक्ति यह मान सकता है कि मशीन उसकी भावनाओं को पूरी तरह समझती है, जबकि एआई के पास मानवीय अनुभव, नैतिक निर्णय, नैदानिक विवेक और वास्तविक सामाजिक संदर्भ को समझने की सीमाएं हैं।
आत्महत्या या आत्महानि जैसे संकटपूर्ण मामलों में यह सीमा और अधिक गंभीर हो जाती है। व्यक्ति हमेशा सीधे शब्दों में अपनी स्थिति व्यक्त नहीं करता। उसके संकेत अप्रत्यक्ष, अस्पष्ट या सांस्कृतिक संदर्भों में छिपे हो सकते हैं। यदि एआई ऐसी चेतावनियों को पहचानने में विफल रहता है या समय पर मानवीय सहायता से नहीं जोड़ता, तो नुकसान की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए उच्च जोखिम वाले मामलों में चैटबॉट को बातचीत जारी रखने के बजाय प्रशिक्षित व्यक्ति, हेल्पलाइन या आपातकालीन सेवा की ओर तत्काल मार्गदर्शन करने में सक्षम होना चाहिए।
गोपनीयता भी एक बड़ी चिंता है। मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बातचीत अत्यंत निजी होती है। व्यक्ति अपनी भावनाएं, पारिवारिक परिस्थितियां, संबंध, भय और व्यक्तिगत अनुभव डिजिटल प्रणाली के साथ साझा कर सकता है। ऐसे संवेदनशील डेटा का संग्रह, भंडारण, उपयोग और साझा किया जाना स्पष्ट नियमों तथा मजबूत डेटा सुरक्षा के अधीन होना चाहिए। भारत में डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण संबंधी व्यवस्था के संदर्भ में मानसिक स्वास्थ्य डेटा के लिए विशेष सावधानी आवश्यक है।
इसके अतिरिक्त, एआई में मौजूद एल्गोरिद्मिक पक्षपात भी चिंता का विषय है। भारत की भाषाई, सांस्कृतिक, लैंगिक और सामाजिक विविधता इतनी व्यापक है कि एक ही मॉडल सभी समुदायों की मानसिक स्वास्थ्य जरूरतों को समान रूप से नहीं समझ सकता। किसी एक भाषा, वर्ग या सांस्कृतिक संदर्भ पर आधारित प्रशिक्षण से तैयार प्रणाली दूसरे समुदाय के लिए अनुपयुक्त सलाह दे सकती है।
इसलिए आगे का रास्ता एआई को रोकना नहीं, बल्कि उसे जिम्मेदारी के साथ विकसित करना है। मानसिक स्वास्थ्य संबंधी एआई प्रणालियों के लिए स्वतंत्र नैदानिक परीक्षण, नियमित सुरक्षा ऑडिट, स्पष्ट जवाबदेही और संकट-स्थिति में मानव विशेषज्ञ तक पहुंचाने के अनिवार्य प्रोटोकॉल होने चाहिए। उच्च जोखिम वाले मामलों में मानव हस्तक्षेप को वैकल्पिक नहीं, बल्कि अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। साथ ही, डिजाइन के स्तर पर ही गोपनीयता, डेटा न्यूनतमकरण और सुरक्षित उपयोग को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
भारत में एआई मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की पहली चौखट को व्यापक बना सकता है। वह उस व्यक्ति तक पहुंच सकता है जो दूरी, खर्च, भाषा या सामाजिक कलंक के कारण चिकित्सक तक नहीं पहुंच पा रहा। लेकिन पहली चौखट और अंतिम मंजिल में अंतर है। मानसिक स्वास्थ्य केवल सूचना या बातचीत का विषय नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना, नैदानिक समझ और निरंतर देखभाल का क्षेत्र है। इसलिए भविष्य की सही दिशा ‘एआई बनाम चिकित्सक’ नहीं, बल्कि ‘एआई के साथ चिकित्सक’ होनी चाहिए। तकनीक पहुंच का विस्तार करे, प्रारंभिक संकेत पहचाने और सहायता की राह आसान बनाए; अंतिम निर्णय और देखभाल में प्रशिक्षित मानव विशेषज्ञ केंद्र में रहें। यही संतुलन भारत में सुरक्षित, सुलभ और मानवीय मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था की आधारशिला बन सकता है।
(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)






