मेरा गुम होता अस्तित्व

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प्रभा इस्सर, देहरादून

आंख खुली मेरी तो मैंने कमरे की चार दीवारों में ख़ुद को उलझे हुए पाएं। चारों तरफ़ मायूसी फैलीं हुईं थीं, कमरे की खुली हुई खिड़की हवा के झोंके से कभी बंद होती तो कभी मेरी जुल्फ़ों से खेलती, तो कभी मुझे उठने को मजबूर करती, क्या हो गया था मुझे, क्यों मैं ख़ुद को इतना टूटा हुआ महसूस कर रही थी।

आज़ ख़ुद की सोच समझ को ताक पर रख क्यों मैं दुनिया के तीखे शब्दों को दिलों, दिमाग, में हावी होने दें रहीं थीं, क्या लगता है मैं अपने अस्तित्व के गले में फंदा डालकर उसे फांसी तक पहुंचा दूं, या फ़िर ख़ुद को बचा लूं, इतनी कमजोर, लाचार, मैंने कभी ना ख़ुद को पाया था,। तभी बारिश की बूंदें मेरे चेहरे से आकर टकराईं और मुझे होश आया,।

मेरे अन्दर अजीब सी चीख दबी हुई थी, जैसे वो मुझे कह रहीं हों, तुम मुझे चीख कर चिल्ला कर अपने अन्दर से बाहर निकालो, अपने दर्द को ख़ुद से बयां करों, ख़ुद को अंधेरे की चादर से ढकना बंद करों, गुस्से के उबाल को कहना सीखों, ख़ुद को अपने अस्तित्व को बचाना सीखों,।

तभी मध्यम सी आहट कानों में आकर गूंजी वो आवाज़ थी मेरे अस्तित्व की, शायद आज़ मैंने अपने अस्तित्व के अनगिनत सवालों के जवाब दे दिए, । आज़ अपने अस्तित्व को सामने गर्व से खड़ा देखकर मैं ख़ुश थी, मुझे लगता है आज मैंने ये जंग अपने आप से जीत ली,। अस्तित्व को खुद के भीतर जगा कर उसे पा कर मैंने आज ख़ुद को बचा लिया,। दोस्तों जीवन में सब कुछ संभव है कुछ भी ऐसा नहीं जो असंभव हो बस ख़ुद को टूटने, बिखरने नहीं देना, फिर देखो जीवन कितना आसान, और सरल हो जाएगा

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