
पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं को राजनीतिक भागीदारी देने के लिए आरक्षण लागू किया गया, लेकिन अनेक स्थानों पर निर्वाचित महिला सरपंचों और पार्षदों की जगह उनके पति प्रशासनिक और राजनीतिक अधिकारों का उपयोग कर रहे हैं। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र, महिला सशक्तिकरण और संविधान की मूल भावना के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है।
- कब खत्म होगी ‘सरपंच पति’ संस्कृति?
- महिला आरक्षण और पुरुष नियंत्रण का विरोधाभास
- लोकतंत्र में महिला नेतृत्व की असली चुनौती
- महिलाओं के नाम पर सत्ता कौन चला रहा है?
डॉ. प्रियंका सौरभ
भारत में लोकतंत्र की जड़ें केवल संसद, विधानसभा और बड़े राजनीतिक मंचों में नहीं, बल्कि गांवों, कस्बों और नगरों की स्थानीय संस्थाओं में भी गहराई से फैली हुई हैं। पंचायतें और नगर निकाय लोकतंत्र की वह सबसे छोटी लेकिन सबसे जीवंत इकाई हैं, जहाँ जनता अपने प्रत्यक्ष प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन में भागीदारी करती है। इन्हीं संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए संविधान ने आरक्षण का प्रावधान किया, ताकि वे केवल घरेलू दायरे तक सीमित न रहें, बल्कि निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभा सकें। लेकिन आज एक कटु सच्चाई यह है कि अनेक स्थानों पर महिला सरपंच और महिला पार्षद केवल नाम की प्रतिनिधि बनकर रह गई हैं, जबकि वास्तविक कामकाज उनके पति या परिवार के पुरुष सदस्य संभाल रहे हैं। यही स्थिति “सरपंच पति” और “पार्षद पति” जैसी संज्ञाओं को जन्म देती है।
यह प्रश्न केवल औपचारिकता का नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ा हुआ है। जब कोई महिला निर्वाचित होकर पद संभालती है, तो उसके पीछे जनता का विश्वास, संवैधानिक अधिकार और राजनीतिक हिस्सेदारी होती है। यदि उसकी जगह कोई और व्यक्ति निर्णय लेता है, बैठकों में भाग लेता है या प्रशासनिक कार्य करता है, तो यह उस जनादेश का अपमान है, जिसे मतदाताओं ने दिया था। महिला प्रतिनिधि के नाम पर किसी पुरुष का सत्ता चलाना न केवल लोकतांत्रिक मर्यादा का उल्लंघन है, बल्कि यह आरक्षण नीति की मूल भावना को भी कमजोर करता है।
73वें और 74वें संविधान संशोधन ने भारत में स्थानीय स्वशासन को नया आयाम दिया। इन संशोधनों के माध्यम से पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण सुनिश्चित किया गया। उद्देश्य यह था कि महिलाएं पंचायतों में केवल संख्या के रूप में न दिखें, बल्कि नेतृत्व, प्रशासन, योजना-निर्माण और नीति-क्रियान्वयन में भाग लें। इससे लाखों महिलाएं स्थानीय राजनीति में आईं, जिनमें अनेक ने असाधारण क्षमता, संवेदनशीलता और जनसंपर्क का परिचय दिया। कई महिला सरपंचों ने जल, स्वच्छता, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य किए। इससे यह भी सिद्ध हुआ कि अवसर मिलने पर महिलाएं किसी भी तरह पुरुषों से कम नहीं हैं।
फिर भी यह भी सच है कि व्यापक सामाजिक संरचना आज भी पितृसत्तात्मक है। गांवों में, विशेषकर उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में, महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में स्वतंत्र रूप से भाग लेने के लिए पर्याप्त सामाजिक स्वीकृति नहीं मिलती। कई बार वे पढ़ी-लिखी होते हुए भी परंपरागत दबावों, पारिवारिक नियंत्रण और भय के कारण निर्णय लेने से बचती हैं। कुछ जगहों पर तो विवाह के बाद महिला प्रतिनिधि की राजनीतिक पहचान लगभग समाप्त हो जाती है और उसका स्थान पति ले लेता है। परिणामस्वरूप उसका संवैधानिक अधिकार कागज़ पर तो बना रहता है, लेकिन व्यवहार में वह अधिकार परिवार के पुरुष सदस्य के हाथ में चला जाता है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
समस्या की जड़ केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक और संस्थागत दोनों है। कई परिवारों में यह मानसिकता बन गई है कि महिला प्रतिनिधि का पद वास्तव में “परिवार का पद” है, जिसका संचालन पति या ससुर करेंगे। ऐसा सोचने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि निर्वाचित पद किसी परिवार को नहीं, एक व्यक्ति को मिला होता है। कानून की दृष्टि से भी पदाधिकारी वही होता है, जिसे जनता ने चुना है। यदि कोई दूसरा व्यक्ति उसके नाम पर निर्णय लेने लगे, तो यह प्रतिनिधि शासन की अवधारणा के विरुद्ध है। इससे न केवल महिलाओं की स्वतंत्रता सीमित होती है, बल्कि यह भविष्य की महिला नेतृत्व पीढ़ी के लिए भी गलत संदेश देता है।
हरियाणा राज्य सूचना आयोग द्वारा इस मुद्दे पर की गई टिप्पणी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। आयोग ने स्पष्ट कहा कि महिला सरपंचों की जगह उनके पतियों का सरकारी बैठकों या प्रशासनिक कार्यों में भाग लेना गलत है। यह कथन केवल प्रशासनिक सख्ती का संकेत नहीं है, बल्कि यह इस सच्चाई की ओर भी इशारा करता है कि महिला आरक्षण को अभी भी गंभीरता से लागू करने की आवश्यकता है। यदि निर्वाचित प्रतिनिधि के अधिकार किसी और को सौंपे जाने लगें, तो फिर निर्वाचन प्रक्रिया का अर्थ ही क्या रह जाता है? आयोग की टिप्पणी ने इस बहस को फिर से राष्ट्रीय विमर्श में ला दिया कि क्या हम वास्तव में महिलाओं को सत्ता दे रहे हैं, या केवल उनका नाम इस्तेमाल कर रहे हैं?
कई लोगों का तर्क होता है कि ग्रामीण महिलाएं अक्सर अशिक्षित, अनुभवहीन या सामाजिक दबाव में होती हैं, इसलिए उनके पति प्रशासनिक काम संभाल लेते हैं। यह तर्क आंशिक रूप से सही हो सकता है, लेकिन यह समस्या का समाधान नहीं है। किसी महिला की कमजोरी के कारण उसका अधिकार उससे छीन लेना न्यायसंगत नहीं हो सकता। यदि कोई महिला पढ़ी-लिखी नहीं है, तो उसे शिक्षा दी जानी चाहिए। यदि उसमें प्रशासनिक अनुभव की कमी है, तो उसे प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। यदि सामाजिक दबाव है, तो समाज और प्रशासन को उसे सुरक्षा और सहयोग देना चाहिए। समस्या का इलाज अधिकार हस्तांतरण नहीं, बल्कि अधिकार-सशक्तिकरण है।
यहीं पर राज्य और समाज की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों को कार्यप्रणाली, वित्तीय प्रबंधन, कानून, ग्रामसभा संचालन, विकास योजनाओं और शिकायत निवारण की उचित जानकारी दी जाए। केवल चुनाव कराकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं है। यदि महिलाओं को नियमित प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और संस्थागत सहयोग मिले, तो वे आत्मविश्वास के साथ नेतृत्व कर सकती हैं।
अंततः यह प्रश्न केवल महिलाओं का नहीं, बल्कि लोकतंत्र की गुणवत्ता का है। यदि निर्वाचित पदों का संचालन अनिर्वाचित लोग करने लगें, तो फिर जनता की इच्छा का क्या अर्थ रह जाता है? यदि महिला प्रतिनिधियों के अधिकार पुरुषों के हाथों में जाते रहें, तो समानता की संवैधानिक घोषणा केवल कागज़ी बनकर रह जाएगी। इसलिए समय आ गया है कि “सरपंच पति” और “पार्षद पति” जैसी प्रवृत्तियों पर कठोर रोक लगे। महिलाओं को केवल नाम की नहीं, वास्तविक शक्ति की भागीदारी मिले। तभी पंचायतें, नगर निकाय और स्थानीय शासन वास्तव में लोकतांत्रिक बनेंगे।
लोकतंत्र का असली परीक्षण चुनाव परिणामों में नहीं, बल्कि निर्वाचित प्रतिनिधियों की स्वतंत्र कार्यक्षमता में होता है। जब महिला सरपंच अपने अधिकारों का प्रयोग स्वयं करेगी, जब महिला पार्षद अपनी बात स्वयं रखेगी, जब प्रशासन उनके साथ सीधे संवाद करेगा, तभी हम कह सकेंगे कि भारत में महिला सशक्तिकरण ने वास्तविक आकार लिया है। अन्यथा यह केवल आरक्षण की औपचारिकता रह जाएगी। इसलिए अब समय है कि समाज, प्रशासन और राजनीतिक व्यवस्था मिलकर यह सुनिश्चित करें कि महिला प्रतिनिधियों के हक का उपयोग उनके पति नहीं, स्वयं महिलाएं करें। यही संविधान की भावना है, यही लोकतंत्र की मर्यादा है, और यही सामाजिक न्याय की सच्ची दिशा भी।





