
यह कविता समकालीन काव्य-जगत में बढ़ती बाहरी चमक, तुकबंदी और दिखावे के बीच सच्चे भावों और विचारों के संकट को रेखांकित करती है। रचना इस प्रश्न को उठाती है कि क्या कविता केवल शब्दों का प्रदर्शन है या संवेदना और सत्य की अभिव्यक्ति। अंततः कविता यह संदेश देती है कि वास्तविक सम्मान शब्दों से नहीं, बल्कि सत्य और व्यवहार से मिलता है।
- शब्दों की चमक और भावों का संकट
- जब कविता बन जाए बाज़ार
- तुकों के शोर में खोता सत्य
- सच्चे कवि की पहचान
डॉ. प्रियंका सौरभ
कविता के बाजार में, बिकती झूठी शान।
सच्चे शब्दों की यहाँ, कौन करे पहचान॥
तुकों की चकाचौंध में, खोया गहरा भाव।
शब्द सजाकर बेचते, सूना अपना गाँव॥
मंचों पर जयकार है, भीतर सूना ज्ञान।
ताली के व्यापार में, खो बैठा सम्मान॥
शब्दों का श्रृंगार है, मन में नहीं विचार।
कागज़ भरते जा रहे, कैसे सृजनहार॥
भाव बिना कविता लगे, जैसे सूना खेत।
बरसे चाहे शब्द तब, रहे रेत सब रेत॥
कलम उठी जब स्वार्थ से, मर जाते सब भाव।
शब्द बचे बस खोल से, डूब गई सब नाव॥
कवि वही जो सत्य की, रखे सदा पहचान।
शब्द नहीं, व्यवहार से, मिलता है सम्मान॥
(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)
डॉ. प्रियंका सौरभ
पीएचडी (राजनीति विज्ञान)
कवयित्री | सामाजिक चिंतक | स्तंभकार
उब्बा भवन, आर्यनगर हिसार (हरियाणा) – 125005








