देवभूमि के गाँवों में खेती-बाड़ी में बारिश से हो रही है समस्या

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भुवन बिष्ट

रानीखेत। देवभूमि उत्तराखंड के पहाड़ के गांवों में आजकल खेतीबाड़ी असोज का कार्य का प्रगति पर है। गाँवों में असोज के कार्य में बीच बीच में बारिश होने से बहुत बड़ी समस्या का सामना किसानों को करना पड़ता है क्योंकि ग्रामीण अंचलों में गाँवों में सभी के पास भंडारण की व्यवस्था होना संभव नहीं है। खेती बाड़ी से संबधित असोज के कार्य में घास कटान का कार्य भी पशुपालन के लिए बहुत बड़ी भूमिका निभाता है.

क्योंकि इस समय काटी गयी घास को किसान वर्षभर पशुपालन चारा के लिए भंडारण करके रखते हैं। ग्रामीण अंचलों में लूठे के रूप में इसका संग्रहण भंडारण किया जाता है। मडूवा भी इस समय तैयार हो जाता है उसे सूखाना चूटना और संग्रहीत करने का कार्य भी प्रगति पर है साथ ही दलहनी फसलें भी तैयार हैं इन्हें सूखने संग्रहीत करने के लिए धूप की नितांत आवश्यकता होती है। बारिश में ये सड़कर खराब हो जाती हैं जिससे वर्षभर की मेहनत बेकार हो जाती है। भारत भूमि और हमारी देवभूमि उत्तराखंड कृषि प्रधान रहे हैं देवभूमि उत्तराखंड की धड़कन हैं गांव।

देवभूमि के पहाड़ के गांवों में कृषि, पशुपालन,फलोत्पादन, सब्जी उत्पादन, खेती-बाड़ी प्रमुख रूप से जीविकोपार्जन का एक सशक्त माध्यम रहे हैं। गाँवों में कृषि उपजाऊ भूमि में धान, मडूवा,गहत, रैस, भट, दलहनी फसलें लहलहाती हुई दिखाई देती हैं। असोज के महिने में प्रत्येक घर के हर सदस्य की अपने अपने कृषि कार्य को संपन्न कराने में सम्पूर्ण भूमिका रहती है बच्चे,बूढ़े,जवान सभी का योगदान और सभी की व्यस्तता हमें एकता में शक्ति और एकता से हर कार्य आसानी से होने का भी अहसास कराती है। आजकल पहाड़ के गांवों में असोज का कार्य जो की खेती बाड़ी से जुड़ा हुआ है प्रगति पर है किन्तु बारिश इसमें दखल डाल दे रही है।

ग्रामीण अंचलों में भंडारण की व्यवस्था होना संभव नहीं है। खेती-बाड़ी से संबधित कार्य में घास कटान का कार्य भी पशुपालन के लिए बहुत बड़ी भूमिका निभाता है…

आजकल मडूवा काटना, फिर उसे चूटना अर्थात विशुद्ध मानवीय शक्तियों का उपयोग करके उसके बीज अलग करना तथा दलहनी फसलों रैस गहत आदि का कार्य भी प्रगति पर है। इन सभी में आजकल घास को काटकर सूखाना व लूठे के रूप में चारा संग्रहण करने का कार्य भी प्रगति पर है। लेकिन अचानक हो रही बारिश से किसानों को इससे नुकसान हो रहा है क्योंकि कटी हुई घास, मडूवा, दलहनी फसलें बारिश से सड़ कर खराब हो जाती हैं।

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