
साइबर अपराधी अब सरकारी विभागों, बैंकों, बीमा कंपनियों और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के डेटा का दुरुपयोग कर लोगों को ठगी का शिकार बना रहे हैं। निजी जानकारी हासिल होने के कारण ठग खुद को अधिकृत कर्मचारी बताकर लोगों का विश्वास जीत लेते हैं और बैंक खाते खाली कर देते हैं। विशेषज्ञों ने ओटीपी, पासवर्ड और बैंकिंग जानकारी साझा न करने तथा केवल अधिकृत माध्यमों का उपयोग करने की सलाह दी है।
- निजी जानकारी के सहारे खातों में सेंध लगा रहे साइबर अपराधी
- ओटीपी और पासवर्ड साझा करना पड़ सकता है भारी
- ऑनलाइन खरीदारी और बीमा भुगतान में बरतें विशेष सावधानी
- सरकारी योजनाओं के लाभार्थी भी साइबर ठगी के निशाने पर
देहरादून। तकनीक के बढ़ते उपयोग के साथ साइबर अपराध भी लगातार नए रूप धारण कर रहे हैं। अब साइबर ठग केवल फर्जी कॉल और संदेशों के जरिए ही लोगों को निशाना नहीं बना रहे, बल्कि सरकारी विभागों, बैंकों, बीमा कंपनियों और ऑनलाइन कारोबार से जुड़े संस्थानों के डेटा तक पहुंच बनाकर सुनियोजित तरीके से ठगी की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि व्यक्तिगत जानकारी के दुरुपयोग के कारण साइबर अपराध पहले से कहीं अधिक खतरनाक और विश्वसनीय दिखाई देने लगे हैं।
हाल के वर्षों में साइबर अपराधियों ने लोगों की निजी जानकारी हासिल कर उन्हें आर्थिक नुकसान पहुंचाने के अनेक तरीके विकसित किए हैं। सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों, बीमा पॉलिसी धारकों, बैंक ग्राहकों और ऑनलाइन खरीदारी करने वाले उपभोक्ताओं की व्यक्तिगत जानकारी का इस्तेमाल कर ठग उन्हें अपना शिकार बना रहे हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि अपराधियों के पास कई बार ऐसी सूचनाएं होती हैं जो सामान्यतः केवल संबंधित संस्थान या अधिकृत कर्मचारियों के पास ही उपलब्ध होती हैं।
साइबर विशेषज्ञों के अनुसार डेटा में सेंध लगाने के लिए अपराधी केवल हैकिंग का सहारा नहीं ले रहे, बल्कि तकनीकी विशेषज्ञों, डेटा चोरी करने वाले नेटवर्क और कई मामलों में संस्थानों के पूर्व या वर्तमान कर्मचारियों का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। डेटा लीक होने के बाद ठग संबंधित व्यक्ति से संपर्क कर स्वयं को बैंक अधिकारी, बीमा एजेंट, सरकारी कर्मचारी या ई-कॉमर्स कंपनी का प्रतिनिधि बताकर विश्वास हासिल कर लेते हैं। क्षेत्र में सामने आए कई मामलों ने इस खतरे की गंभीरता को उजागर किया है। एक मामले में बाल विकास विभाग की अनुदान योजना के लिए आवेदन करने वाले लाभार्थियों का डेटा साइबर अपराधियों के हाथ लग गया। इसके बाद अपराधियों ने लाभार्थियों से संपर्क कर सरकारी योजना का लाभ दिलाने का झांसा दिया और मुंडाखेड़ा खुर्द गांव के 15 से अधिक लोगों के खातों से डेढ़ लाख रुपये से अधिक की रकम निकाल ली।
दूसरे मामले में एक व्यापारी की बीमा पॉलिसी संबंधी जानकारी साइबर ठगों तक पहुंच गई। ठगों ने स्वयं को बीमा कंपनी का प्रतिनिधि बताकर प्रीमियम जमा कराने के नाम पर व्यापारी से 25 हजार रुपये से अधिक की ठगी कर ली। चूंकि अपराधियों को पॉलिसी संबंधी विस्तृत जानकारी थी, इसलिए व्यापारी को उन पर संदेह नहीं हुआ। एक अन्य घटना में ऑनलाइन खरीदारी करने वाले ग्राहक की जानकारी अपराधियों के हाथ लग गई। ग्राहक के ऑर्डर और भुगतान संबंधी विवरण के आधार पर ठगों ने ऑर्डर रद्द कराने और रिफंड दिलाने का झांसा दिया। इस प्रक्रिया में ग्राहक को विभिन्न ऑनलाइन चरणों में उलझाकर उसके क्रेडिट कार्ड से 1.13 लाख रुपये निकाल लिए गए। इसी प्रकार खेड़ी गांव के एक ग्रामीण को बैंक कर्मचारी बनकर फोन किया गया। खाते के सत्यापन और सुरक्षा अपडेट के नाम पर आवश्यक बैंकिंग जानकारी हासिल कर साइबर ठग ने उसके खाते से 1.72 लाख रुपये की रकम उड़ा ली। ऐसे मामलों में पीड़ितों को अक्सर तब तक धोखाधड़ी का पता नहीं चलता, जब तक बैंक खाते से रकम कटने का संदेश नहीं मिल जाता।
विशेषज्ञों का कहना है कि साइबर अपराधी अब केवल तकनीकी कमजोरी का नहीं, बल्कि लोगों की मनोवैज्ञानिक प्रवृत्तियों का भी फायदा उठा रहे हैं। वे तत्काल लाभ, सरकारी सहायता, बोनस, बीमा रिफंड, केवाईसी अपडेट, बैंक खाता बंद होने की चेतावनी या ऑनलाइन ऑर्डर रद्द होने जैसी परिस्थितियां पैदा कर लोगों को जल्दबाजी में निर्णय लेने के लिए मजबूर करते हैं। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों ने नागरिकों को सतर्क रहने की सलाह देते हुए कहा है कि बैंकिंग, बीमा या किसी भी वित्तीय कार्य के लिए यथासंभव संबंधित कार्यालय या अधिकृत कर्मचारी से ही संपर्क किया जाए। किसी भी अनजान व्यक्ति को ओटीपी, पासवर्ड, सीवीवी नंबर, इंटरनेट बैंकिंग विवरण या अन्य गोपनीय जानकारी नहीं देनी चाहिए।
ऑनलाइन खरीदारी करते समय केवल विश्वसनीय और सुरक्षित वेबसाइटों का उपयोग करना चाहिए। बैंकिंग कार्यों के लिए वेबसाइट का यूआरएल स्वयं टाइप कर खोलना अधिक सुरक्षित माना जाता है। ईमेल, व्हाट्सएप या एसएमएस के माध्यम से प्राप्त संदिग्ध लिंक पर क्लिक करने से बचना चाहिए। किसी भी ऑफर, इनाम या सरकारी लाभ के नाम पर आने वाले कॉल की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना आवश्यक है। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि यदि किसी व्यक्ति को बैंक, बीमा कंपनी या सरकारी विभाग के नाम से फोन आए और सामने वाला निजी जानकारी मांगे, तो तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए। अधिकतर संस्थान फोन पर ओटीपी, पासवर्ड या बैंकिंग विवरण नहीं मांगते। ऐसी किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत साइबर हेल्पलाइन या स्थानीय पुलिस को देनी चाहिए।
बढ़ते डिजिटल लेनदेन के दौर में साइबर सुरक्षा अब केवल तकनीकी विषय नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की व्यक्तिगत जिम्मेदारी भी बन गई है। थोड़ी सी सावधानी और जागरूकता आर्थिक नुकसान से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। साइबर अपराधियों के बदलते तौर-तरीकों को देखते हुए विशेषज्ञ लगातार लोगों से सतर्क रहने और किसी भी अनजान कॉल या संदेश पर आंख बंद करके भरोसा न करने की अपील कर रहे हैं।





