
मो. मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर
हम समझते रहे उन्हें अपना
वो अपना समझ ना सके
हम तो बड़े प्यार से पेश आए
वो भाषा प्यार की समझ ना सके
सुनने को तैयार नहीं कुछ भी
फिर भी हम गुनगुनाते रहे
कभी ग़ज़ल कभी कविता सुनाते रहे
आयी नहीं तब्दीली जरा भी उनके रुख़ पर
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हमहीं अपना दु:खरा सुनाते रहे
कभी ले जाते चांद पर
तो कभी सितारों की सैर कराते रहे
जागी ना वो नींद से
आंखें बंद कर मुस्कुराते रहे
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मैं भी छोड़ने वाला नहीं
चाहे तड़पाते रहें?
कितना भी वो?
कभी तो आएगा पल वो
जब चल पड़ेंगे साथ दोनों
डाल हाथों में हाथ
तारों से करते हुए बात
चांदनी में नहाते
धरती पर आते
देख हमें सैकड़ों सिर हिलाते
ताली बजाकर करते स्वागत
आओ जांबाज हम हैं नतमस्तक तेरे आगे!
¤ प्रकाशन परिचय ¤
![]() | From »मो. मंजूर आलम ‘नवाब मंजूरलेखक एवं कविAddress »सलेमपुर, छपरा (बिहार)Publisher »देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड) |
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