
मनुष्य का मन अनंत इच्छाओं और आवश्यकताओं के बीच निरंतर सक्रिय रहता है। मन को संयमित करने और सही दिशा देने में विवेक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। स्वच्छ मन ही सरल, संतुलित और स्वस्थ समाज की नींव रख सकता है।
- मन, इच्छाएं और अर्थशास्त्र का संबंध
- मन को नियंत्रित करना क्यों जरूरी है
- इच्छाओं के बीच विवेक का मार्ग
- स्वच्छ मन से स्वच्छ समाज की ओर
आशुतोष, पटना, बिहार
जिस प्रकार हम ब्रह्माण्ड के विषय में सब कुछ नहीं जानते, ठीक उसी प्रकार लोगों के मन को भी हम लाख अध्ययन के बावजूद नहीं जान सकते। जैसे आवश्यकताएँ अनंत हैं, यह कथन प्रायः मशहूर है और सत्य भी। उसी तरह मनुष्य का “मन” चंचल और अनंत इच्छाओं की पूर्ति के लिए अनंत पथ पर चलता है। तरह-तरह की इच्छा का नित जागरण होता है और सभी लोग उसकी पूर्ति के लिए सदैव तत्पर रहते हैं।
मन का व्यक्ति के अर्थशास्त्र से गहरा रिश्ता रहा है, जिसे समझना हर किसी के लिए आवश्यक है और हर वह मनुष्य समझता है या वक्त उसे समझा देता है। जिस प्रकार हम अपनी ज्ञानेंद्रियों को संयमित कर एक स्वच्छ चरित्र का निर्माण कर सकते हैं, ठीक उसी तरह हम मन को संयमित कर एक स्वच्छ मन का निर्माण कर सकते हैं। इसमें ज्ञानेंद्रियों के साथ-साथ हमें क्रोध, लोभ, आकर्षण…
मन को संयमित करना एक कठिन कार्य माना गया है, जिसका सीधा सम्बन्ध संतुष्टि से है। पर यहाँ भी विरोधाभास की स्थिति है। क्योंकि अगर संतुष्टि ही मन का रूप है तो फिर संतुष्ट व्यक्ति की इच्छाएँ नहीं हो सकतीं, पर इच्छा तो होती है, तो फिर मन का संतुष्टि से सम्बन्ध है, लेकिन कुछ हद तक। इसे अर्थशास्त्र की दृष्टि से समझने की कोशिश किया जाए तो आवश्यकता से समझा जा सकता है। कोई भी आवश्यक वस्तु का उपयोग उस व्यक्ति के लिए उपयोगी होगा, जिसे ज्यादा जरूरी होगी, लेकिन उस वस्तु की इच्छा सभी की हो जाए तो वस्तु कम पड़ जाएगी और कलह शुरू हो जाएगा, अर्थात माँग के अनुसार वस्तु की अनुपलब्धता।
उसी तरह मन की अनेक-अनेक इच्छाएँ विपरीत से विपरीत परिस्थिति में भी जागृत होती हैं, पर विवेक के साथ मन का मार्ग चुनना ही पड़ता है। जो व्यक्ति मन को सही मार्ग की तरफ मोड़ लेते हैं, उन्हें सुगमता, सरलता, विनम्रता, कर्तव्यपरायणता और समानता से परिचय होता है और जो मन को भटका लेते या विपरीत दिशा में ले जाते, वे कर्तव्यहीनता, उद्दंडता, विनाशिता, विलासिता और दुराचारिता के पथ पर चलते हुए जीवन को कई उलझनों में धकेल देते हैं। एक मन और कई इच्छाओं का जन्म होता है, जिसकी पूर्ति के लिए कई अनैतिक कार्य जन्म लेते हैं, जो कभी मानव को सुरक्षित और स्थिर नहीं रहने देते।
आज का दौर विलासिता से भरी वस्तु के पीछे भागते-भागते बीत रहा है। जीवन सुगमता और सरलता ढूँढता रहता है। सभी लोग यही चाहते हैं, काश सब कुछ रिमोटेबल हो जाए। बहुत हद तक है भी। तो क्या जो रिमोटेबल हो गए हैं, उनका मन शांत क्यों नहीं है? सवाल उठता है, उनका मन और ज्यादा रिमोटेबल होना चाहता है। जो नहीं है, वो वहाँ तक पहुँचना चाहता है, अर्थात सभी का मन कार्यरत और अनेकों इच्छाओं को पाल रहा है।
यही वो समय है, जब मार्ग का चयन आवश्यक हो जाता है। और आपका विवेक आपके मन को कंट्रोल करने लगता है, अच्छे और बुरे कार्यों को समझने लगता है और मन को नियंत्रित करता है। जो संयमित हैं और अपनी इच्छाओं को समय के साथ ढाल लेते हैं, वही सरल, सुगम और सुंदर हैं। इसी तरह के मन वाला व्यक्ति स्वच्छ समाज और सामाजिकता ला सकता है। मन का स्वच्छ होना ही एक सामाजिक पहल है। स्वच्छ मन वाला व्यक्ति ही स्वच्छ समाज की कल्पना करता है और सामाजिक सहयोग भी। समाज में सभी समुदाय एक-दूसरे पर आश्रित हैं।







