
यह कविता राष्ट्रभक्ति, एकता, लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान के प्रति सम्मान का संदेश देती है। कवयित्री देश को सर्वोपरि मानते हुए प्रेम, शांति और राष्ट्रीय स्वाभिमान के साथ भविष्य निर्माण का आह्वान करती हैं।
- राष्ट्रभक्ति का सच्चा संदेश
- एक तिरंगा, एक पहचान
- देश से बड़ा कुछ नहीं
- भारत-भूमि से सच्चा नेह
डॉ. प्रियंका सौरभ
राष्ट्र प्रथम का भाव हो,
हो यह सच्चा परिवेश।
देश-विरोधी सोच से, होता केवल क्लेश॥
मिट्टी जिसकी देह में,
बसे श्वास में प्राण।
उस भारत पर वार दें,
जीवन का सम्मान॥
राष्ट्र-भक्ति से ही बने,
जन-जन सदा विशेष—
देश-विरोधी सोच से,
होता केवल क्लेश॥
भाषाएँ हों भिन्न सब,
भिन्न रहें परिधान।
एक तिरंगा बाँधता,
भारत की पहचान॥
एकता का दीप ही,
करता नव-उन्मेष—
देश-विरोधी सोच से,
होता केवल क्लेश॥
वीरों के बलिदान का,
रखना सदा विचार।
उनके कारण ही मिला,
स्वतंत्रता का द्वार॥
उनकी गौरव-गाथा दे,
हमको शुभ संदेश—
देश-विरोधी सोच से,
होता केवल क्लेश॥
मतभेदों का हो सदा,
लोकतांत्रिक मान।
किन्तु न टूटे राष्ट्र का,
मूल स्वाभिमान॥
संविधान की राह से,
बढ़े राष्ट्र-परिवेश—
देश-विरोधी सोच से,
होता केवल क्लेश॥
‘सौरभ’ भारत-भूमि से,
रखिए सच्चा नेह।
राष्ट्र प्रथम का मंत्र ही,
जीवन का सद्गेह॥
मिलकर गढ़ें भविष्य हम,
प्रेम, शांति, परिवेश।
राष्ट्र प्रथम का भाव हो,
हो यह सच्चा परिवेश।
देश-विरोधी सोच से,
होता केवल क्लेश॥
(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)
डॉ. प्रियंका सौरभ
पीएचडी (राजनीति विज्ञान)
कवयित्री | सामाजिक चिंतक | स्तंभकार
उब्बा भवन, आर्यनगर हिसार (हरियाणा) – 125005









