
यह आलेख संयुक्त परिवार, मधुर व्यवहार, मौन की शक्ति और अनुशासित जीवन के महत्व को रेखांकित करता है। लेखक ने बताया है कि सुख, शांति और संबंधों की मजबूती का आधार संवाद, संयम और अच्छे व्यवहार में निहित है।
- सुख और संबंधों की डोर
- वाणी, व्यवहार और जीवन
- अनुशासन से सफलता तक
- मधुरता से बनते रिश्ते
सुनील कुमार माथुर
जोधपुर, राजस्थान
आनंदमय जीवन व्यतीत करना भी एक कला है। पुराने जमाने में यह कला सभी जानते थे। यही वजह है कि हमारे बड़े-बुजुर्गों ने संयुक्त परिवार को बांधे रखा और परिवार के किसी भी सदस्य को कभी भी दुःख नहीं झेलना पड़ा। लेकिन संयुक्त परिवारों के विघटन के साथ ही साथ आनंदमय जीवन व्यतीत करने की कला भी आज लुप्त-सी हो गई है। परिवार में सुख, शांति और समृद्धि एक तरह से स्वप्न-सा हो गया है। इसलिए ध्यान रहे कि संयुक्त परिवार सुख, शांति और समृद्धि के मोतियों की डोर से बंधा रहे और उसके परिवार के सभी सदस्य सदैव हंसते-मुस्कुराते रहें।
कहते हैं कि इंसान की आधी खूबसूरती उसकी वाणी में होती है और आधी खूबसूरती उसके मौन व व्यवहार में होती है। इसलिए इंसान को सदैव अपनी वाणी पर नियंत्रण रखना चाहिए व अनावश्यक नहीं बोलना चाहिए। दिन भर चक-चक करते रहने से न जाने कब आपके मुख से गलत शब्द या कड़वे बोल निकल जाएं, जो सामने वाले की भावना को ठेस पहुंचा दें और आपको पता भी नहीं पड़े। अतः जरूरत पड़ने पर ही सोच-समझकर मधुर मुस्कान के साथ अच्छा व्यवहार करें व मीठे बोल बोलें, ताकि सामने वाला आपके व्यवहार से सदा-सदा के लिए आपका हो जाए। आपका मौन आपकी वाणी को नियंत्रित करता है। जहां तक हो तटस्थ रहें और जहां बोलना है वहां जरूर बोलें, लेकिन सोच-समझकर ही बोलें। हमारा श्रेष्ठ व्यवहार ही हमारी पहचान है।
बड़े-बुजुर्ग कहते हैं कि जो हृदय से दिया जा सकता है वह हाथों से नहीं और जो मौन रहकर दिया जाता है वह शब्दों से नहीं। बात बड़ी सटीक है। हमारी वाणी मधुर होगी तो चंद दिनों में हजारों-लाखों लोग हमारे हितैषी हो जाएंगे और वाणी में कटुता व कठोरता होगी तो चंद दिनों में ही लाखों हमारे हितैषी हमसे अलग हो जाएंगे। अतः सभी के साथ अच्छा व्यवहार रखें। आजकल इंतजार कराने वालों की कोई कमी नहीं है। समय देकर भी समय पर न पहुंचना एक आम बात हो गई है। इसलिए इंतजार उसका क्यों, जो तुम्हारे इंतजार की कीमत समझे; उसका नहीं जो तुम्हें फालतू समझे। चूंकि अनुशासन कठिन जरूर लगता है, पर आदत बन जाए तो सफलता की गारंटी है। चिंता करोगे तो भटक जाओगे और चिंतन करोगे तो आप राष्ट्र की मुख्यधारा से कटे हुए व्यक्ति को भी सही राह दिखा सकोगे।
सुनील कुमार माथुर
सदस्य अणुव्रत लेखक मंच एवं
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार
33 वर्धमान नगर, शोभावतों की ढाणी, खेमे का कुआं, पाल रोड, जोधपुर, राजस्थान







