
यह आलेख भारत के मध्यम वर्ग की आर्थिक भूमिका और उसकी बढ़ती असुरक्षा पर केंद्रित है। लेख में ‘मिसिंग मिडिल’ की अवधारणा के माध्यम से रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, महंगाई, सामाजिक सुरक्षा और वित्तीय स्थिरता से जुड़ी चुनौतियों का विश्लेषण किया गया है। साथ ही मध्यम वर्ग को सशक्त बनाने के लिए नीतिगत सुधारों की आवश्यकता पर बल दिया गया है।
- भारतीय मध्यम वर्ग और आर्थिक सुरक्षा का संकट
- विकास की धुरी, लेकिन असुरक्षित मध्यम वर्ग
- ‘मिसिंग मिडिल’ की चुनौती और भारत का भविष्य
- रोजगार, महंगाई और मध्यम वर्ग की बढ़ती चिंता
डॉ. प्रियंका सौरभ
भारत आज विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। वैश्विक मंच पर उसकी बढ़ती आर्थिक शक्ति, विशाल युवा आबादी, डिजिटल क्रांति और बढ़ते उपभोक्ता बाजार की चर्चा लगातार हो रही है। इस विकास यात्रा के केंद्र में यदि कोई सामाजिक-आर्थिक वर्ग सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, तो वह है भारत का मध्यम वर्ग। यही वर्ग देश में उपभोग बढ़ाता है, बचत करता है, निवेश करता है, कर देता है, शिक्षा और कौशल में निवेश करता है तथा आर्थिक गतिविधियों को निरंतर गति प्रदान करता है। किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था में मध्यम वर्ग को विकास का इंजन माना जाता है, क्योंकि उसकी आय और आकांक्षाएं उत्पादन तथा बाजार दोनों को संचालित करती हैं।
भारत में भी मध्यम वर्ग को भविष्य के आर्थिक विकास, सामाजिक स्थिरता और लोकतांत्रिक मजबूती का आधार माना जाता है। इसके बावजूद एक विडंबना यह है कि भारतीय मध्यम वर्ग का बड़ा हिस्सा स्वयं आर्थिक रूप से सुरक्षित नहीं है। वह गरीबी से ऊपर तो उठ चुका है, लेकिन स्थायी समृद्धि और सुरक्षा तक नहीं पहुंच पाया है। यही स्थिति अर्थशास्त्र में “मिसिंग मिडिल” अर्थात “लुप्त या कमजोर मध्य वर्ग” की परिघटना के रूप में पहचानी जाती है।
‘मिसिंग मिडिल’ का अर्थ
‘मिसिंग मिडिल’ का आशय उस स्थिति से है, जिसमें समाज में गरीबों और अमीरों के बीच स्थित मध्यम वर्ग पर्याप्त रूप से मजबूत नहीं होता या उसकी आर्थिक स्थिति इतनी स्थिर नहीं होती कि वह किसी संकट का सामना कर सके। भारत में लाखों परिवार ऐसे हैं, जो आय के आधार पर मध्यम वर्ग में गिने जाते हैं, लेकिन उनके पास पर्याप्त बचत, सामाजिक सुरक्षा, गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच या दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता नहीं होती।
परिणामस्वरूप वे किसी बीमारी, नौकरी जाने, व्यवसाय में नुकसान या आर्थिक मंदी जैसी परिस्थितियों में तेजी से आर्थिक संकट में फंस सकते हैं। कोविड-19 महामारी ने इस वास्तविकता को बहुत स्पष्ट रूप से सामने ला दिया था। महामारी के दौरान लाखों ऐसे परिवार, जो स्वयं को मध्यम वर्ग का हिस्सा मानते थे, अचानक आय के स्रोत समाप्त होने, चिकित्सा खर्च बढ़ने और रोजगार अस्थिर होने के कारण आर्थिक कठिनाइयों में आ गए। इससे यह स्पष्ट हुआ कि भारत का मध्यम वर्ग संख्या में बड़ा होने के बावजूद सुरक्षा के मामले में कमजोर है।
मध्यम वर्ग की आर्थिक भूमिका
भारतीय मध्यम वर्ग की सबसे बड़ी शक्ति उसकी उपभोग क्षमता है। देश में घर, वाहन, इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं, शिक्षा, स्वास्थ्य, बीमा, पर्यटन और डिजिटल सेवाओं की मांग का बड़ा हिस्सा इसी वर्ग से आता है। जब मध्यम वर्ग की आय बढ़ती है, तो वह अधिक वस्तुओं और सेवाओं की खरीद करता है, जिससे उद्योगों का विस्तार होता है, निवेश बढ़ता है और नए रोजगार सृजित होते हैं।
यही कारण है कि विकसित देशों की आर्थिक सफलता के पीछे मजबूत मध्यम वर्ग को एक प्रमुख कारक माना जाता है। भारत भी यदि विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है, तो उसे अपने मध्यम वर्ग को अधिक मजबूत और सुरक्षित बनाना होगा। लेकिन वर्तमान में यह वर्ग कई प्रकार की चुनौतियों से घिरा हुआ है।
प्रमुख चुनौतियाँ
रोजगार की अस्थिरता: भारत में रोजगार का एक बड़ा हिस्सा अभी भी असंगठित क्षेत्र में है। यहां कार्यरत लोगों को नियमित वेतन, भविष्य निधि, पेंशन, स्वास्थ्य बीमा या अन्य सामाजिक सुरक्षा लाभ नहीं मिलते। गिग अर्थव्यवस्था और प्लेटफॉर्म आधारित रोजगार ने नए अवसर तो पैदा किए हैं, लेकिन उनमें भी दीर्घकालिक सुरक्षा का अभाव है।
स्वास्थ्य और शिक्षा का बढ़ता खर्च: गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं की सीमित सरकारी उपलब्धता के कारण मध्यम वर्ग को निजी संस्थानों पर निर्भर रहना पड़ता है। बच्चों की शिक्षा, कोचिंग, उच्च शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाला खर्च परिवारों की आय का बड़ा हिस्सा खा जाता है।
महंगाई और जीवन-यापन की लागत: महानगरों और बड़े शहरों में आवास, परिवहन, ऊर्जा, भोजन और अन्य आवश्यक सेवाओं की कीमतों में लगातार वृद्धि हुई है। परिणामस्वरूप मध्यम वर्ग को अपने जीवन स्तर को बनाए रखने के लिए अधिक ऋण लेना पड़ता है।
सामाजिक सुरक्षा का अभाव: गरीबों के लिए कल्याणकारी योजनाएं हैं और उच्च आय वर्ग के पास निजी संसाधन। लेकिन मध्यम वर्ग अक्सर इन दोनों के बीच फंस जाता है। वह अधिकांश सरकारी सहायता योजनाओं का पात्र नहीं होता, जबकि निजी सुरक्षा की पूरी लागत उठाना भी उसके लिए कठिन होता है।
छोटे और मध्यम उद्यमों की भूमिका
भारत में छोटे और मध्यम उद्यमों की सीमित वृद्धि भी ‘मिसिंग मिडिल’ की समस्या को बढ़ाती है। छोटे व्यवसाय वित्त, तकनीक और बाजार तक पर्याप्त पहुंच के अभाव में बड़े नहीं बन पाते। यदि ये उद्यम मजबूत हों, तो वे रोजगार सृजन और आय वृद्धि के माध्यम से मध्यम वर्ग का विस्तार कर सकते हैं।
संपत्ति निर्माण की चुनौती
विकसित देशों में मध्यम वर्ग के पास आवास, पेंशन फंड, निवेश पोर्टफोलियो और अन्य वित्तीय परिसंपत्तियां होती हैं, जो उन्हें दीर्घकालिक सुरक्षा प्रदान करती हैं। भारत में बड़ी संख्या में मध्यमवर्गीय परिवारों की बचत सीमित होती है और उनका अधिकांश संसाधन दैनिक खर्चों तथा बच्चों के भविष्य पर केंद्रित रहता है। इससे वे पर्याप्त संपत्ति निर्माण नहीं कर पाते।
समाधान की दिशा
भारत के मध्यम वर्ग को एक मजबूत और लचीली आर्थिक शक्ति में बदलने के लिए बहुआयामी नीति हस्तक्षेप आवश्यक हैं—
- गुणवत्तापूर्ण और सुरक्षित रोजगार सृजन को प्राथमिकता दी जाए।
- स्वास्थ्य और शिक्षा में सार्वजनिक निवेश बढ़ाया जाए।
- सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का दायरा मध्यम वर्ग तक विस्तारित किया जाए।
- किफायती आवास और वित्तीय समावेशन को बढ़ावा दिया जाए।
- छोटे और मध्यम उद्यमों को वित्तीय एवं तकनीकी सहायता प्रदान की जाए।
- कर प्रणाली को अधिक संतुलित और न्यायसंगत बनाया जाए।
अंततः यह कहा जा सकता है कि भारत का मध्यम वर्ग केवल एक आर्थिक श्रेणी नहीं, बल्कि देश की विकास यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक आधार है। यह वर्ग उपभोग, निवेश, नवाचार और सामाजिक स्थिरता का वाहक है। किंतु ‘मिसिंग मिडिल’ की परिघटना के कारण इसका बड़ा हिस्सा आर्थिक रूप से असुरक्षित बना हुआ है। यदि भारत को दीर्घकालिक और समावेशी विकास सुनिश्चित करना है, तो उसे अपने मध्यम वर्ग को केवल संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि सुरक्षा, अवसर और संपन्नता के आधार पर भी मजबूत बनाना होगा। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, वित्तीय समावेशन और उद्यमिता को केंद्र में रखकर बनाई गई नीतियां ही इस वर्ग को एक सशक्त और लचीली आर्थिक शक्ति में बदल सकती हैं। जब भारत का मध्यम वर्ग वास्तव में सुरक्षित, आत्मनिर्भर और समृद्ध होगा, तभी देश की विकास गाथा अधिक टिकाऊ, समावेशी और व्यापक बन सकेगी।
(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)
डॉ. प्रियंका सौरभ
पीएचडी (राजनीति विज्ञान)
कवयित्री | सामाजिक चिंतक | स्तंभकार उब्बा भवन, आर्यनगर हिसार (हरियाणा)






